मंगलवार, 15 नवंबर 2016

सम्बन्धों की फुहारें - भाटी नीम्बा और रतनू भीमा

मारवाड़ के चाणक्य कहे जाने वाले भाटी गोयन्ददास के दादा की कथा है यह, उनका नाम नीम्बा था । यह नीम्बा उस समय उचियारड़े नामक ग्राम में रहता था, जहां सोलंकी राजपूतों का आधिक्य था । यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि यह नीम्बा भाटी ‘जैसा’ का पौत्र था ।इस जैसा को राव जोधा अपने संकट काल में इस वचन के साथ अपने साथ जैसलमेर रियासत से लाये थे कि वे राजकीय आय का चौथा हिस्सा उसे देंगे ।

यह ‘जैसा’ जैसलमेर के रावल केहर का पौत्र और राजकुमार कलिकर्ण का पुत्र था व सुप्रसिद्ध हड़बू सांखला का दोहिता था, पर मंडोर हाथ आते ही जोधा ने वचन भुला दिया । परिणामत: जैसा का पुत्र अणदा सामान्य स्थिति में आ गया और उसकी संतान यत्र-तत्र रहने लगी । नीम्बा के इसी सामान्य काल की इस कहानी में संबंधों की वह सुगंध है, जो सामन्ती काल की नैतिकता और प्रतिबद्धता को सामने लाती है ।

इस नीम्बा भाटी के साथ जुड़े पात्र रतनू भीमा के संबंध में भी जानना जरूरी है, रतनू चारणों का सम्बन्ध इतिहास के उस काल से है, जब जैसलमेर की स्थापना नहीं हुई थी और भाटी तन्नौट के शासक थे । तब देवराज नामक भाटी राजकुमार की बारात बिठोड़े (भटिंडा) गई थी ।जहां पूरी बरात को वराहों ने काट डाला था, जान बचाकर भागते राजकुमार का शत्रु पीछा कर रहे थे, उस  संकटकाल में देवायत नामक पुष्करणा ब्राह्मण ने उसे बचाया था । शत्रुओं को उसने राजकुमार को अपना बेटा बताया था और अपने पुत्र रतन के साथ खाना खिलवाकर  उसके शत्रुओं से उसकी प्राण रक्षा की थी ।

उसके बाद  ब्राह्मणों ने उस रतन को जाति से निकाल दिया था, भाटी देवराज ने लौद्रवा के शासक बनते ही इस रतन की शादी चारणों में करवाकर उसे अपना सम्मानित प्रोलपात बना दिया था । इसलिए रतनू चारण भाटियों से अपना भाई का सम्बन्ध मानते थे और भाटी उन्हें बड़े भाई और उद्धारक का मान देते थे । रतनू भीमा इसी शाखा से सम्बन्ध रखता है, इसलिए भाटी नीम्बा से उसके आत्मीय सम्बन्ध हैं ।

यह घटना एक दशहरे के उत्सव की है, उस उत्सव में चारण भीमा रतनू भी उपस्थित था । उचियारड़ा ग्राम में दशहरा मनाया जा रहा था और देवी पूजन किया जा रहा था । देवी की पूजा के लिए बलि का विधान था ।
अत: बलि के लिए खाजरू (बकरा) लाया गया, जो बकरा बलि हेतु लाया गया था, उसकी गर्दन के नीचे लम्बे बाल दाढ़ी की तरह लटक रहे थे । भाटी नीम्बा के भी लम्बी दाढ़ी थी । जब बलि के लिए बकरा लाया जा रहा था, तब कुछ सांखलों के किशोर-युवा उस बकरे को ‘नीम्बाजी भाटी’ नाम से संबोधित करते हुए भाटी नीम्बा का उपहास करने लगे, न केवल उपहास ही किया बल्कि बलि देते समय भी कहा कि ‘नीम्बाजी भाटी’ की बलि दी जा रही है । यह सब रतनू भीमा ने अपनी आँखों से के सामने घटित होते देखा, उसका खून खौल उठा । वह अकेला सांखलों का तो कुछ बिगाड़ नहीं सकता था, इसलिए वहां तो कुछ नहीं बोला पर उसके कलेजे में आग लगी थी ।

वह सीधा नाई के पास पहुंचा और भदर हो गया, भदर होना मृत्युसूचक संकेत होते हैं, जिसमें व्यक्ति न केवल मुण्डन करवाता है, अपितु दाढ़ी-मूंछ भी मुंडवा लेता है । ठीक मृत्युसूचक बाना धारण कर रतनू भीमा भाटी नीम्बा के पास पहुंचा । भाटी नीम्बा ने भीमा से पूछा – ‘बारहठजी किसके पीछे भदर हुए हो ?’ भीमा ने सजल आँखों से कहा – ‘नीम्बाजी भाटी के पीछे ।’ भाटी नीम्बा के बात समझ में नहीं आई, तब रतनू भीमा ने सारी बात बताई और यह भी कहा कि बात केवल किशोरों-युवाओं की होती, तब भी परिहास समझ कर उसे छोड़ा जा सकता था, पर किसी बुजुर्ग तक ने उन्हें टोका नहीं, उलटे हंसने लगे ।

भाटी नीम्बा यह सब सुनकर तिलमिला उठे, उन्होंने अपना साथ इकट्ठा किया और बलि-पूजा में उन्मादित सांखलों पर टूट पड़े । बचेखुचे सांखले गाँव छोड़ कर भाग गए, तब जाकर रतनू भीमा के कलेजे में ठंडक पड़ी, पर चीजों का अंत कहाँ होता है । बचेखुचे सांखलों में से एक सांखला आगरा जा पहुंचा और पठान जलालखां जलवानी के यहाँ नौकर हो गया ।

लोकाख्यानों में आता है कि इस पठान जलालखां जलवानी ने अपने उस नौकर के कहने से भाटी नीम्बा और उसके साथियों को उचियारड़े ग्राम में खत्म कर दिया था । यह भी सुनने में आता है कि भाटी नीम्बा ‘गिरी-सुमेल’ की लड़ाई में घायल हो गया था और वह अपने घायल साथियों के साथ अपने गाँव में  घावों का उपचार कर रहा था, कि यह घटना घटित हो गई ।

उसका पुत्र भाटी माना किसी तरह बच निकला और केलावा ग्राम में अज्ञातवास में रहने लगा । वहां उसकी स्थिति यह थी कि घर में खाने पीने के लाले पड़ रहे थे । पत्नी गर्भवती थी, बच्चा होनेको था, पर घर में फूटी कौड़ी भी नहीं थी । लाचार माना ने चोरी करने की ठानी । गर्भवती पत्नी को कराहते छोड़कर वह चोरी करने निकला ।

पास में ही ऊँटों के टोले (समूह) के साथ एक व्यापारिक कारवाँ रुका हुआ था । वह कारवाँ के ऊँटों में छिप कर चोरी का मौका तलाश ही रहा था कि उसके घर में लड़के होने की सूचक थाली बजी । थाली बजने की ध्वनि सुनकर कारवाँ के साथ चल रहे शकुनी ने भविष्यवाणी करते कहा  - ‘अगर यह बच्चा राजपूत के घर जन्मा है तो बड़ा प्रतापी होगा और राजा भी इससे सलाह लेकर काम करेगा । और अगर यह बच्चा जाट के घर जन्मा है तो गाँव में इसका डाला लूण पड़ेगा ।’ भविष्यवाणी सुनकर माना शकुनी के चरणों में गिर पड़ा और अपनी सारी बेबशी व हकीकत बताई ।

हकीकत सुनकर शकुनी जो जाट था, उसे कारवां के मालिक के पास ले गया और भाटी माना को रोटी-पानी की सहायता की । अनाज की पोटली लेकर जब वह घर पहुंचा, तब दाई ने पहले तो माना को इस स्थिति में पत्नी को छोड़ जाने के लिए डांटा । फिर पत्नी की आंवळ ( गर्भ-नाल ) का बर्तन देते हुए कहा कि इसे हाथ भर गहरा गड्ढा खोदकर गाड़ना ताकि कोई जानवर निकाल नहीं पाए । अपने घर के पिछवाड़े जब माना ने हाथ भर गहरा गड्ढा खोदा तो उसका हाथ किसी धातु के बर्तन से टकराया । खोदकर निकालने पर उस ताम्बे के बर्तन में सोने की मोहरें मिली| शकुनी की भविष्यवाणी सच्च होने की शुरुआत हो चुकी थी | यही बच्चा आगे चल कर इतिहास प्रसिद्ध भाटी गोयन्ददास ( गोविन्ददास ) के नाम से विख्यात हुआ ।।

साभार- आईदानसिंह भाटी

गुरुवार, 8 सितंबर 2016

शहीद पूनमसिंह भाटी


भारत के इतिहास में और वीर योद्धा भूमि राजस्थान की बलीदानी परम्परा में जैसलमेर में जन्मे पुनमसिंह भाटी का नाम अमर है । पांचवी कक्षा तक अध्ययन करने के पश्चात् सत्रह वर्षीय पूनमसिंह सन 1956 में राजस्थान में चलाये गए ऐतिहासिक भूस्वामी आंदोलन का सत्याग्रही सत्यागढ़ी बनकर जेल चले गए । तीन माह की जेल भुगतने के पश्चात् पूनमसिंह नोकरी की तलाश में लग गए । अक्टूम्बर 1961 में वह अपने ग्राम साथी सुल्तान सिंह भाटी के साथ पुलिस सेवा में भर्ती हो गए !
 जैसलमेर जिला मुख्यालय से लगभग 120 किलोमीटर दूर भारत पाक सीमा की भुट्टो वाला सीमा चौकी पर राजस्थान पुलिस के कुल चार पाँच सिपाहियों के साथ जैसलमेर जिले के हाबुर (वर्तमान पूनमनगर) गांव का एक नवयुवक पूनम सिंह भाटी अपने देश की सरहद हिफाजत में अपने कर्तव्य का पालन कर रहा था ।इनके पिताजी का नाम जय सिंह भाटी और माताजी का नाम श्रीमती धाय कँवर था।
09 सितम्बर के दिन अपने गांव हाबुर में कुलदेवी माँ स्वांगियां का मेला था ।अपनी कुलदेवी के मेले में जाकर आशीर्वाद प्राप्त करने की चाह में 08 सितम्बर के दिन अस्त होने से पूर्व ही पूनम सिंह अवकाश लेकर अपने गांव की तरफ निकल पड़ा।
1965 के उस दौर में आवागमन के लिए मात्र ऊंट पर ही निर्भर रहना पड़ता था । भुट्टो वाला चौकी से भाटी का गांव लगभग 70 किमी की दुरी पर था । 
अभी भुट्टो वाला से 10 किमी तक का सफर ही तय किया था कि सामने पूनम सिंह के मुंह बोले एक भाई का गोळ (रहने का अस्थाई निवास)था। अपने मुंहबोले भाई के अनुरोध पर भाटी ने रात वहीँ रुकने का निश्चय किया , सोचा रात को यहाँ आराम करने के बाद सुबह गांव की और जल्दी निकलेंगे। लेकिन माँ स्वांगिया और कुदरत को कुछ और ही मंजूर था । रात को अपने मुंह बोले भाई और उसके बेटे की कानाफूसी सुनकर पूनम सिंह ने उनसे बात पूछी की आखिर माजरा क्या है। भाई ने कहा- कि पूनम अब तुम्हे अपने गांव की और निकलना चाहिए ताकि सुबह माता के मेले में समय से पहुँच सके। 
कुछ समय पूर्व रात यंहा रुकने का अनुरोध करने वाला यह भाई ऐसा क्यों बोल रहा है इसकी सचाई भांपते इस वीर को ज्यादा समय खर्च नहीं करना पड़ा। भाई के बेटे ने पूनम के सामने सारी बात एक ही साँस में कुछ यूँ रखी -" पाकिस्तान के कमांडर अफजल खान के साथ लगभग 40 घुसपैठिये भुट्टो वाला चौकी पर कब्जा करने के लिए चौकी की तरफ कूच कर चुके है लेकिन आप के तो ड्यूटी से 2-4 दिन के लिए अवकाश लिया हुआ है इसीलिए कह रहे है कि आप गांव की और निकल जाइये"।
आँखों में अंगारे उतर आये भाटी के एक ही झटके में खड़ा होकर सिंह की मानिंद गर्जना की-"पूनम सिंह भाटी अगर इस समय अपने कदम पीछे की और बढ़ाता है तो यह  जैसाण का अपमान होगा, अपमान होगा मेरी जन्मदात्री का, अपमान होगा भाटियों के उस विड़द उत्तर भड़ किवाड़ भाटी का,अपमान होगा भाटी वंश के उन तमाम वीरों का जिन्होंने जैसाण रक्षा हेतु केशरिया किया था , मेरा पीछे की ओर पड़ा हर एक कदम लज्जित करेगा गढ़ जैसाण को,लज्जित करेगा मेरी माँ के दूध को , पूनम सिंह के जिन्दा रहते भुट्टो वाला चौकी को अफजल खान तो क्या पूरी पाकिस्तानी आर्मी भी नहीं जीत सकती इतना कहते ही बिजली की गति से अपने ऊंट पर सवार होकर निकल पड़ा वापिस भुट्टो वाला चौकी की तरफ।
रात में चन्द्रमा की रौशनी में चारों तरफ फैले थार के इस महान रेगिस्तान का हर एक अंश सोने की तरह दमक रहा था । रात के इस सन्नाटे में धीमी गति से चलने वाली पवन की सांय-सांय को चीरता पूनम का ऊंट अपने मालिक को ले जा रहा था अपने गन्तव्य की ओर ।ऊँट जितना तेज दौड़ सकता था उतना तेज दौड़े जा रहा था मानो उसे भी अपने मालिक की तरह अपनी सरजमीं की हिफाजत का जूनून सवार हो।आधी रात को पूनम ने अपनी चौकी में प्रवेश किया । 
वहां बैठे हवलदार गुमान सिंह रावलोत के साथ  अन्य सिपाही पूनम के चेहरे को पढ़ने की कोशिस कर है थे कि आखिर हुआ क्या है इतनी जल्दी यह वापिस क्यों आ गया? उनके हर एक सवाल का जवाब पूनम ने पास में रखी बन्दूक उठाकर दिया । इस समय पूनम का बन्दूक संभालना उन वीरों को यह समझाने के लिए काफी था कि हमला किसी भी वक्त हो सकता है। 
अभी समय ज्यादा नहीं हुआ था कि चन्द्रमा की रौशनी में पूनम ने लगभग 35-40 इंसानी परछाइयों को चौकी की तरफ आते देखा। तब तक साथी भी समझ चुके थे कि चौकी को चारों और से दुश्मनों ने घेर लिया है।
एक क्षण तो पूनम का चेहरा रक्तवर्ण का हो चुका था आँखों में अंगारे तैर आये लेकिन दूसरे ही पल अपने आपको सँभालते हुए अपने साथियों को निर्देश देने लगा -"हमारे पास गोलियों की कमी है हर एक गोली सोच समझकर चलानी है एक भी गोली व्यर्थ नहीं जानी चाहिए"। इतना कहकर रेत के बने अपने बंकर में मोर्चा संभाल लिया। दूसरे साथी भी मोर्चा संभाले हुए थे पहली गोली चलने के बाद उस चांदनी रात में दुश्मनो के लिए साक्षात् महाकाल बनकर टूटा पूनम।
माँ स्वांगिया के आशीर्वाद से इस बियाबान रेगिस्तान में पूनम और उसके साथियों की बन्दुके रह रहकर आग उगल रही थी । पूनम सिंह और उसके साथियों को एक बात निश्चित पता थी कि इस रेगिस्तान में हिंदुस्तानी सेना या राजस्थान पुलिस की सहायता मिलना बहुत ही मुश्किल था क्योंकि उस दौर में संचार के साधन नहीं थे । मोर्चा लिए हुए पूनम अपने साथियों में लगातार जोश भर रहा था तथा उन्हें यह बात भी अच्छे से समझा दी कि हम हमारे जीते जी अपनी इस चौकी को छोड़ नहीं सकते इसलिए केवल एक ही रास्ता है कि इन घुसपैठियों का काम तमाम करना ।रात के अँधेरे में पुराने हथियारों के दम पर माँ भारती के इन सपूतों ने पाकिस्तानी कमांडर अफजल खान सहित लगभग 15 घुसपैठियों को ढेर कर दिया था जिसमे अफजल खान सहित कुल 7 की मौत पूनम के अचूक निशाने का परिणाम थी।
इस दौरान अपने कमांडर के मारे जाने से विरोधियों के पैर उखड़ने लगे थे । उन्हें आज समझ आ गया था कि उनका पाला भारत के शेरों से पड़ा है । हालाँकि बन्दुके अभी भी गरज रही थी लेकिन अब हर एक गोली छूटने के काफी देर बाद दूसरी गोली छूट रही थी ।4-5 घण्टे के इस मैराथन युद्ध में हमारी पुलिस की गोलियां लगभग समाप्त हो गयी थी । एक बार फिर पूनम के साथियों के माथे पर चिंता की लकीरे आ गई क्योंकि वे जानते थे सुबह होने में महज  घण्टे भर का फासला है अगर कारतूसों का बन्दोबस्त नही हो पाया तो चौकी पर कब्जा रोकना असम्भव होगा। 
अपने साथियों की परेशानी देखकर पूनम ने अपने बंकर से बाहर झाँका पास में गिरी एक पाकिस्तानी लाश के कमर पर बंधा कारतूसों का बेल्ट देखकर पूनम की आँखों में चमक सी आ गई।लेकिन वहां तक पहुंचना मुश्किल था क्योंकि उसके ठीक पीछे बाकि के पाकिस्तानी रेत की आड़ में बैठे थे लेकिन भाटी निश्चय कर चुका था उसने रेंगकर किसी तरह उस बेल्ट को पाने में सफलता प्राप्त कर ही ली अब एक बार फिर बाजी भारतीय शेरों के हाथ में थी पाकिस्तानियों के पीछे हटते कदमो को देखकर पुरे जोश के साथ फायरिंग हो रही थी कि तभी दुर्भाग्य से दुश्मन की बन्दूक से निकली एक गोली पूनम के ललाट में धंस गई । पूनम के साथियों के सामने यह एक भयंकर दृश्य था । लेकिन पूनम के चेहरे पर चिर परिचित मुस्कान.......समय मानो अपनी आम रफ़्तार से कुछ तेज दौड़ रहा था साथियों की आँखों में आंसुओ की बाढ़ सी आने लगी थी । पूनम का हर एक साथी उसे मानो यह बताना चाह रहा हो कि देखो तुम्हारी बन्दूक का कमाल दुश्मन पीठ दिखाकर भाग रहा है । लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था सुबह की लालिमा से रेत फिर जगमगा रही थी लेकिन उसी समय जैसलमेर की धरा का एक सपूत चिर निद्रा के आगोश में समा चुका था।पूनम ने फिर इस राजस्थान भूमि का नाम रोशन कर दिया जिसके बारे में कहा जाता रहा है कि रेगिस्तान कि भूमि वीर प्रसूता भूमि है।
कुछ समय बाद नजदीकी गांव साधना में पूनम सिंह के शहीद होने की सुचना पहुंची गांव वालों और पुलिसवालों के सहयोग से भाटी के पार्थिव शरीर को पहले साधना गांव लाया गया।
दूसरी और हाबुर गांव में कुलदेवी के मेले की तैयारियां चल रही थी बच्चे ,बूढ़े,महिलाये और युवा माँ स्वांगिया की पूजा हेतु तैयार होकर जाने ही वाले थे कि पूनम के शहीद होने की खबर आ गई । पुरे गांव में आग की तरह फैली यह ख़बर ।क्या बूढ़ा क्या जवान हर एक ग्रामीण कि छाती गर्व से फूली हुई थी।
पूनम के घर में सिसकियाँ के साथ परिवारजनो को ढांढस बंधाया जा रहा था ग्रामीण जोश में एक दूसरे को गर्व से बता रहे थे कि -पूरी रात डटा रहा अपना पूनम अपने मोर्चे पर, और पाकिस्तानियों को भगाकर ही सांस छोड़ी ।
उसी दिन शहीद का पार्थिव शरीर जैसलमेर शहर लाया गया । जहाँ आम जनता अपने इस हीरो को अंतिम बार नजर भरकर देख रही थी। हर कहीं से एक ही आवाज आ रही थी कि आज फिर जैसाण के एक बहादुर सिपाही ने अपने अदम्य साहस से अपने कुल,अपने परिवार,अपने वँश की बलिदानी परम्परा को अक्षुण् रखने हेतू,अपनी भारत माँ के चरणो में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।
धन्य है हाबुर की वो परम धरा जहाँ ऐसे सपूत ने जन्म लिया, धन्य है वो माँ जिसने पूनम जैसे वीर को जन्म दिया, धन्य है वो पिता जिसने अपने बेटे में मातृभूमि के लिए मर मिटने के संस्कार डाले। 
इन सबके साथ धन्य हुआ भुट्टो वाला का वो रेगिस्तान जहाँ इस बहादुर के रक्त की बुँदे गिरी।
मरणोपरांत शहीद को राष्ट्रपति पदक से समान्नित किया गया तथा शहीद पूनम सिंह के नाम से उनके गांव का नाम बदलकर श्री पूनमनगर किया गया । जैसलमेर शहर में शहीद पूनम सिंह स्टेडियम का निर्माण भी करवाया गया।
शहीद पूनम सिंह बलिदान दिवस समिति के संयोजक ठाकुर लख सिंह पूनमनगर के प्रयासों से शहीद के बलिदान दिवस अब प्रत्येक वर्ष 09 सितम्बर को जैसलमेर जिला मुख्यालय एवम् भाटी के  पैतृक गांव में मनाये जाते हैं।तथा पुरानी भुट्टो वाला सीमा चौकी(रामगढ से 50 किमी) पर भी भाटी की छतरी पर पूजा अर्चना की जाती है।
पुनमे नों हाबोनों आज भी लोकगीत उनकी याद में गाये जाते है आज उनके सहादत दिवस पर शत शत नमन धन्य है धरा ऐसे सपूत पैदा हुए

जगदेव परमार

जगो यहाँ पर जगदेवों की लगी है बाजी जान की।
अलबेलों ने लिखी खड़ग से गाथाएँ बलिदान की।॥

जगदेव परमार मालवा के राजा उदयादित्य के पुत्र थे। मालवा की राजधानी धारानगरी थी जो कालान्तर में उज्जैन नगर के नाम से प्रसिद्ध हुई। मालवा के परमार वंश में हुए राजा भर्तृहरि बाद में महान नाथ योगी (सन्त) बने, भर्तृहरि के छोटे भाई राजा वीर विक्रमादित्य बड़े न्यायकारी राजा हुये। विक्रम सम्वत इसी ने हुणों पर विजय के उपलक्ष में चलाया था। विद्याप्रेमी एवं वीर भोज भी मालवा के परमार राजा थे, जो स्वयं विद्वान थे। बारहवीं शताब्दी में इस प्रदेश ने एक ऐसा अनुपम रत्न प्रदान किया जिसने वीरता और त्याग के नये-नये कीर्तिमान स्थापित कर क्षात्र धर्म को पुनः गौरवान्वित किया। यह वीर थे जगदेव परमार। लोक गाथाओं में इन्हें वीर जगदेव पंवार के नाम से याद किया जाता है।

राजा उदयादित्य की दो पत्नियाँ थी। एक सोलंकी राजवंश की और दूसरी बाघेला राजवंश की। सोलंकी रानी के जगदेव नाम का पुत्र और बघेली रानी से दूसरा पुत्र रिणधवल था। राजकुमार जगदेव बड़ा थे। राजकुमार जगदेव साहसी योद्धा था और सेनापति के रूप में उसकी कीर्ति सारे देश में फैल गई थी। अपनी बाघेली रानी के प्रभाव से प्रभावित होकर उदयादित्य ने रिणधवल को युवराज चुना। अपनी सौतेली माता की ईर्ष्या के कारण जगदेव कष्टमय जीवन व्यतीत कर रहे थे। वह मालवा से चले गये और जीविका के लिए गुजरात में सिद्धराज जयसिंह के अधीन सैनिक सेवा स्वीकार की। वह अपनी वीरता और स्वामीभक्ति से बहुत ही अल्पकाल में अपने स्वामी के प्रिय हो गये। कुछ आसन्न संकट से सिद्धराज की सुरक्षा करने के लिए अपने जीवन को अर्पण किया। जगदेव परमार ने कंकाळी (देवी) के सामने अपना मस्तक काट कर अर्पित कर दिया था, जिससे देवी ने उसके बलिदान से प्रसन्न होकर उन्हें पुनर्जीवित कर दिया था। जगदेव ने यह बलिदान अपने स्वामी पर आए संकट के अवसर पर दिया था। जब राजा को उसके इस बलिदान का पता लगा तो उसने प्रसन्न होकर उनको एक बहुत बड़ी जागीर दी। और अपनी एक पुत्री का विवाह जगदेव के साथ कर दिया।

कुछ समय बाद यह सूचना पाकर कि सिद्धराज मालवा पर आक्रमण करने की तैयारियाँ कर रहा है, उसने अपना पद त्याग कर अपनी जन्मभूमि की रक्षा करने के लिए धारा नगरी चला आया। उसके पिता ने उसका बड़े स्नेह से स्वागत किया और रिणधवल के स्थान पर जगदेव को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। उदयादित्य की मृत्यु के पश्चात् जगदेव मालवा के सिंहासन पर बैठे।

राजस्थान की लोक गाथाओं में वह जगदेव पंवार के नाम से जाने जाते है जबकि मालवा में लक्ष्मदेव के नाम से प्रसिद्ध हुये। जगदेव वि.सं. ११४३ (ई.स. १०८६) के लगभग मालवा के राजा बने। वह एक बड़ी सेना लेकर दिग्विजय के लिए निकले। बंगाल के पाल राजा पर आक्रमण कर वहाँ से बहुत से हाथी लूटकर लाये। इसके बाद चेदी प्रदेश के कलचुरियों पर आक्रमण करने के लिए बढे। उस समय वहाँ यश:कर्ण का राज्य था। यश:कर्ण साहसी योद्धा था और चम्पारण विजय कर कीर्ति प्राप्त की थी। किन्तु वह मालवा सेना के आक्रमण के सामने ठहर नहीं सका। जगदेव (लक्ष्मदेव) ने उसके राज्य को पद दलित किया और उसकी राजधानी त्रिपुरी को लूटा। उसने अङ्ग और कलिंग राज्य की सेनाओं को परास्त किया।
जगदेव ने दक्षिण भारतीय राज्यों पर भी आक्रमण किए थे। लेकिन दक्षिणी राज्यो में आपस में मैत्री होने से वह सफल न हो सके। मालवा के दक्षिण में चोलों का राज्य था। दोनों राज्यों के बीच बहुत कम दूरी रह गई थी। इस क्षेत्र पर अधिकार करने के लिए दोनों ही राज्य लालायित थे अतः दोनों में युद्ध होना अवश्यंभावी हो गया। जगदेव का चोल राजा कुलोतुंग प्रथम से संघर्ष हुआ। युद्ध में चोल पराजित हुए।

गुजरात के सीमान्त पहाड़ी क्षेत्रों में बर्बर पहाड़ी जनजातियाँ निवास करती थी जो सन्त, पुण्यात्मा ऋषियों को निरन्तर दुःख देते थे। जगदेव ने उन बर्बर जातियों को दण्डित किया। कांगड़ा जनपद के कीरों से युद्ध कर उन्हें परास्त किया। उसके समय में मुसलमानों ने मालवा पर चढ़ाई की। मुस्लिम सेना को कुछ प्रारम्भिक विजय प्राप्त हुई। किन्तु अंततः वे जगदेव द्वारा पीछे ढकेल दिए गए। जगदेव (लक्ष्मदेव) एक वीर योद्धा और निपुण सेनानायक थे। पश्चिमी भारत के लोग अब भी जगदेव के नाम का उसकी उच्च सामरिक दक्षता व बलिदान के लिए हमेशा स्मरण करते हैं। निश्चय ही वे ग्यारहवीं शती के अन्तिम चरण का एक उतुंग व्यक्ति थे। एक उल्का की तरह वह थोड़े समय के लिए मध्यभारत के क्षितिज में चमके और अपने पीछे चिरकीर्ति छोड़ कर लोप हो गये। शासक के रूप में वह अत्यन्त दयालु, प्रजा वत्सल और न्यायकारी राजा थे। सम्राट विक्रमादित्य और राजा भोज की उदात्त परम्पराएं इन्होंने पुनः शुरु की। वेष बदल कर ये जनता की वास्तविक स्थिति का पता लगाने जाया करते थे। प्रजा की भलाई के अनेक कार्य किये। इनका शासन काल लगभग वि.सं. ११५२ (ई.स. १०९५) तक रहा।

लेखक : छाजूसिंह, बड़नगर

मंगलवार, 23 अगस्त 2016

प्रणय और कर्त्तव्य

कहानी- प्रणय और कर्तव्य
लेखक -स्व आयुवान सिंह शेखावत हुडील

लक्खा सामंत की दृष्टि पंचमी के अस्तप्रायः चन्द्रमा पर गड़ी हुई थी। उसने तरकस से एक बाण निकाला, उसे धनुष पर चढ़ाया और चन्द्रमा की ओर संधान करते हुए मन ही मन कहने लगा- "भगवान राम द्वारा क्रोधित होकर धनुष पर बाण रखते ही समुद्र ने भयभीत होकर मार्ग दे दिया था पर मेरे बाण में आज इतनी शक्ति कहाँ की यह दुष्ट चन्द्रमा भयभीत होकर आकाश से विलुप्त हो जाये। कलियुग में मनुष्यों की शक्ति क्षीण हो गई है। फिर यह चन्द्रमा तो स्वयं दुष्ट और जार है: किसी अभिसारिका की प्रतीक्षा में भूल गया जान पड़ता है।"इतने में ठंडी वायु का झोंका आया, लक्खा की तन्द्रा भंग हुई। उसने आहट पाकर महलों की ओर उत्कंठापूर्ण दृष्टि डाली पर कोई आता हुआ दिखाई नहीं दिया।
वह चन्द्रमा अस्त होने पर ही आएगी।" उसने अपने मन को कुछ प्रतीक्षा करने के लिए समझाया। बुझती हुई मशाल पर उसने और तेल सींचा, ढाल के कसे को अंगुली की सहायता से कुछ ढीला किया और पिछोली बुर्ज़ की विस्तृत छत पर वह टहलने लगा। पिछोली बुर्ज़ का मोर्चा संभालने के कारण उसने दुर्ग पति को मन ही मन धन्यवाद दिया। यदि इस बुर्ज पर उसे तैनात नहीं किया जाता तो वह आकर उससे किसी भी भांति नहीं मिल सकती थी। उसने अपनी नव प्रस्फुटित मूंछों को मरोड़ दी और फिर गर्व के साथ सोचने लगा-" इसमें दुर्गपति का क्या एहसान है? रनिवास की रक्षा के लिए इस पिछोली दुर्ग का कितना अधिक महत्त्व है। इस मोर्चे पर मेरे से अधिक विश्वसनीय, साहसी और वीर इस दुर्ग में और है भी कौन जिसे इस मोर्चे की रक्षा का दायित्व दिया जाता।" उसने फिर चन्द्रमा पर दृष्टि डाली। इस बार वह निःसंदेह मर चुका था। उसने संतोष की साँस ली। उसके ह्रदय की धड़कन बढ़ गई, और धैर्य का बाँध टूटने पर आ गया। इतने में पार्श्व की बुर्ज से "सावधान" की ध्वनि आई। लक्खा ने भी अपनी दोनों उंगलियां कानों में डालीं और उच्च स्वर से "सा-व-धा-न" चिल्ला कर आगे की बुर्ज में ध्वनि पहुंचा दी।
"ऐसे ही सावधान रहा जाता है" कहते हुए किन्हीं दो सुकुमार हाथों ने पीछे से लक्खा की दोनों आँखें बंद दी। उसने कोई प्रतिकार नहीं किया। कुछ क्षणों बाद उसने अपने दोनों हाथों को पीछे लेजाकर और कुछ आगे झुक कर उसे पीठ पर उठा लिया।
"मुझे छोड़ दो आपकी ढाल और तरकस मेरे गड़ते हैं।"
"देर से आने का यही दंड है रूपा" कहते हुए उसने अपना उल्टा बाहुपाश ढीला कर दिया।
"चांदनी में कैसे आती, कोई प्रहरी देख लेता तो ?"
"तो समझ बैठता कि आकाश से कोई देव सुंदरी अवतीर्ण होकर चन्द्रास्त के बाद अपनी दिव्य आभा से इस दुर्ग को प्रकाशमान करने आई है।"
"देव सुंदरी यहाँ क्यों आने लगी?"
"किसी नारी सुंदरी से अपने रूप की तुलना करने।"
"इतनी लावण्यमई कौन नारी सुन्दर हो सकती है।"
लक्खा ने रूपवती के गाल पर हलकी चपत लगाते हुए कहा-"यह नारी सुंदरी।"
रूपावती की पलकें नीचे झुक गईं। मशाल के मंद प्रकाश में लक्खा को सामने खड़ी रूपावती अपूर्व सुंदरी लगी। उसके गोरे गाल पर केशों की एक लट लटक रही थी। मृग शावक सी भोली आँखे, नुकीली नाक, छोटे और पतले होठ और कुछ उभरे हुए कचनार कपोल, साँचे में ढाली हुई सी सुघड़ गर्दन, लम्बी और पतली भुजाएं और पतली कमनीय देह सब कुछ लक्खा को अत्यंत ही मनोहर लग रहे थे। क्षण भर वह इस रूप राशि को देखता रहा, उसको रोमांच हो आया और फिर सहसा उसने रुपावती को अपने आलिंगनपाश में जकड लिया।
"यह क्या करते हो? जानते हो महाराज की क्या आज्ञा है?"
"जो कर्तव्य पालन में लापरवाही या सुस्ती करे उसे मृत्यु दंड_।"
"और स्त्रियों से मिलने सम्बन्धी?"
"जो मोर्चा छोड़ कर स्त्रियों के पास जावे उसे भी मृत्यु दंड।"
"तो अब आप मृत्यु दंड पाने के अधिकारी हैं।"
"नहीं, स्त्री स्वयं ही यदि मोर्चे पर आ जाय तो पुरुष के स्थान पर स्त्री को_।"
" स्त्री को मृत्यु दंड दिया जाय। यही कहना चाहते हो न।"
"हाँ।"
"पर रुपावती इस प्रकार से मृत्यु दंड नहीं स्वीकार कर सकती। वह या तो रणभूमि में मरेगी या जौहराग्नि में। मैंने अभी यहां आते समय मार्ग में जौहर कुण्ड देखा है। हजारों मन लकड़ियों से वह भरा हुआ है। पास में ही सैकड़ों कुप्पे घी और कपूर आदि के रखे हुए हैं। हमें महारानी जी की सदैव तैयार रहने की आज्ञा है। न मालूम कब शत्रु दुर्ग में प्रवेश कर जाये और कब हम महिलाओं को जौहर व्रत लेना पड़े।"
"नहीं रूपा, तुम्हें जौहर व्रत नहीं लेना पड़ेगा। हम उससे पहले ही शत्रु का घेरा तोड़ देंगे।"
"आज तीन महीने हो गए शत्रु को दुर्ग घेरे हुए और तीन महीना बीस दिन हो गए अपना विवाह हुए। विवाह के तुरंत बाद ही जब मेरा भाई मुझे पीहर ले जाने को आया था तब भी आपने यही कहा था कि तुर्क का घेरा लगने वाला है सो उसे महीना, दो महीना में परास्त करके फिर भेजेंगे।"
"रूपा, यह मैंने तुम्हें यहीं रखने के लिए ही कहा था; तुम्हारा वियोग मुझसे सहा नहीं जा सकता। तुर्क की सेना असंख्य है, उसे परास्त करना हंसी-खेल नहीं।"
"तब यह कहो की मैंने जानबूझ कर झूंठ बोला था।"
"हाँ रूपा यही समझना चाहिए। पर अब यदि जाना चाहो तो रात के समय घेरे में से निकाल कर तुम्हें पीहर भेज सकता हूँ।" लक्खा ने अपने दोनों हाथों से रुपावती के गाल सहलाते हुए उसकी आँखों में आँखे गड़ाए हुए कहा।
"न पहले जाना चाहती थी और न अब।" कहते हुए रुपावती ने दीवार से सटे हुए लक्खा के दाहिने कंधे पर अपने सिर रख दिया।
थोड़ी देर की लिए नवदम्पत्ति फिर दो से एक हो गए। ऊपर से उड़ती हुए चमगीदडों ने कदाचित उन्हें देखा होगा। दुर्ग के नीचे गीदड़ों ने बोल कर उनका ध्यान आकर्षित किया, चर्र-चर्र की ध्वनि से चकोर ने उन्हें कुछ सूचना दी। पर वे प्रेम बंधन की डोरी में कसते ही गए। पार्श्व की बुर्ज से फिर सावधान की ध्वनि आई। लक्खा ने उसी अवस्था में "सा-व-धा-न" चिल्ला कर धवनि को आगे धकेल दिया। इस बार उसके स्वर में कंपकंपी थी,तीव्रता कम और गति अधिक थी।

सहसा दो कठोर वस्तुओं की परस्पर टकराने की-सी ध्वनि हुई। दो जने फिर एक से दो हुए। लक्खा ने बुर्ज की दीवार से झुक कर बड़ी सावधानी से दुर्ग के बाहर नीचे देखा। उसने हाथ के इशारे से रुपावती को अपने पास बुलाया और सीधा होकर उसके कान में कुछ कहा। रुपावती ने भी लक्खा के हाथों पर चढ़ कर नीचे देखा। उसे भी अन्धकार में कई छायाकृतियां सी हिलती हुई दिखाई दीं। दो-चार बार फिर आपस में कानाफूसी सी हुई। लक्खा मना कर रहा था और रुपावती हठ कर रही थी। अंत में हठ की विजय हुई।

रुपावती ने अपनी कमर को ओढ़ने के सिरे से कसकर बांधा, टिमटिमाती हुई मशाल पर खूब तेल सींचा और एक हाथ में जलती हुई मशाल और दूसरे में लक्खा की नंगी तलवार लेकर बुर्ज की दीवार पर चढ़ी और तत्काल ही दुर्ग के बाहर कूद पड़ी। पिछोली बुर्ज के नीचे केवल तीन हाथ समतल भूमि थी। उसके नीचे का पहाड़ 50 हाथ नीचे तक तराशा हुआ था। उसके दायें और बाएं पार्श्व के पहाड़ भी उतने ही गहरे तराशे हुए थे जिससे पिछोली बुर्ज समुद्र में स्थित अंतरीप के सामान सुरिक्षित थी। वहां तक पहुंचना असंभव था। केवल घाटियों और ढाल पर उगे हुए वृक्षों की टहनियों के सहारे झूल कर ही वहां पहुंचा जा सकता था। पर ऐसा करने के लिए लगभग 300 हाथ वृक्षों ही वृक्षों के सहारे हाथों से झूलते हुए ही आगे सरकना पड़ता। ऐसा करना साधारण व्यक्तियों के वश की बात नहीं थी और अनजान व्यक्तियों के लिए तो वृक्षों के सहारे दिन में भी वहां पहुंचना असंभव था। इन वृक्षों की अगमता के कारण ही इस ओर दुर्ग रक्षकों की असावधानी का अनुमान लगाकर शत्रुओं ने वहां सेंध लगाने का आयोजन किया था। पिछोली बुर्ज से झपट कर रनिवास पर आसानी से अधिकार किया जा सकता था और इस प्रकार दुर्ग की समस्त रक्षा व्यवस्था को भंग करके आतंक उत्पन्न किया जा सकता था। शत्रु को यह भेद कदाचित किसी भेदू ने दिया था।

एक हाथ में नंगी तलवार और दूसरे में प्रज्ज्वलित मशाल लेकर केसरिया वस्त्रधारी रुपावती बुर्ज से नीचे कूदती हुई, आकाश से उतरती हुई साक्षात दुर्गा सी देदीप्यमान और भयानक जान पड़ी। इस आकस्मिक, अद्भुत और अप्रत्याशित कौशल से शत्रु एकदम भयभीत और किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए। उनके भागने का कोई मार्ग नहीं था।
मशाल के प्रकाश में लक्खा ने देखा तीन हाथ चौड़ी और पचास हाथ लम्बी भूपट्टी पर सैकड़ों यवन भांति-भांति के औजार लिए खड़े हुए हैं। दुर्ग के सर्वाधिक दक्ष धनुर्धर लक्खा ने अपना हस्त कौशल बताना आरम्भ किया। एक बाण छूटता और एक शत्रु चीख मारकर वहीँ धराशायी हो जाता। लक्खा के हाथों में इस समय अर्जुन की स्फूर्ति और राम का बल आ गया था। दस पल में दस और बीस पल में बीस बाण छूटे और बीस शत्रु धराशायी हो गए। इधर रुपावती बुर्ज और दुर्ग की दीवार से सट कर खड़ी हो गई। जो भी शत्रु इधर से उधर भाग कर बचने का प्रयास करता "खच्च" की सी आवाज आती और शत्रु रूपावति के खड्ग-प्रहार से कट कर वहीँ ढेर हो जाता। अद्भुत दृश्य था वह। ऊपर से बाण वर्षा और नीचे से खड्ग प्रहार और यदि भागे तो नीचे गिर कर प्राण गंवाएं।

इस हलचल से पास वाली बुर्जों के प्रहरी सतर्क हुए। नीचे देखा साक्षात भगवती दुर्गा एक हाथ में मशाल लेकर शत्रुओं का संहार कर रही थी। क्षण-प्रति क्षण शत्रु धराशायी हो रहे थे। दुर्ग पर से दो-तीन जलती हुई मशालें और नीचे फैंक दी गईं। ऊपर से पत्थर वर्षा प्रारम्भ हो गई। यह देख कर लक्खा ने अपनी पगड़ी नीचे लटकाई और धीमे से कहा-
"रूपा ! मशाल दूर फैंक दो और शीघ्रता से ऊपर चढ़ आओ। "
"जय चामुण्डा; जय दुर्गा" के जयघोष से पिछोली बुर्ज के दोनों पार्श्व गूंज उठे। बहुतसों ने योगमाया के दर्शन किये, बहुतसों ने नहीं किये और योग माया अंतर्ध्यान हो गई। सैनिकों का उत्साह उमड़ पड़ा। क्यों नहीं उमड़ पड़ता, उनकी और से साक्षात योगमाया जो लड़ रही थी। जिन्होंने योगमाया के दर्शन किये उन्होंने अपने को धन्य माना, जिन्होंने नहीं किये उन्होंने अपने मंद भाग्य को कोसा। बात की बात में समस्त दुर्ग रक्षक और सेना सतर्क हो गई। योगमाया के प्रकट होने की बात कानों-कान सब स्थानों पर पहुँच गई। दुर्गपाल के पहुँचते-पहुँचते किले के नीचे एक भी यवन शेष नहीं बचा था। इतने में दुर्गपति भी आ गए।
उन्होंने पूछा-"क्यों लक्खाराव सब ठीक तो है न?"
"सब ठीक है महाराज! सब शत्रु मार दिए गए हैं।"
पांच-सात जलती हुई मशालें और नीचे फैंक दी गईं। प्रकाश में हताहत व्यक्तियों को गिना- लगभग साठ व्यक्ति बाणों से बिंधे हुए थे और पंद्रह -बीस तलवार से कटे हुए थे। इतने ही का लुढ़क कर मर जाने का अनुमान लगाया गया।
"वीरवर लक्खाराव, क्या भगवती स्वयं प्रकट हुई थीं? दुर्गपति ने लक्खा सामंत के कन्धों पर हाथ रखते हुए आदर से पूछा।
"महाराज मैं बाण चलाने में तन्मय था पर प्रकाश में एक नारी दिखाई अवश्य पड़ी थी।" यह कर कर लक्खा ने मुंह नीचे कर लिया।
"तब प्रहरी सैनिकों की बात सत्य है। हम कितने अहोभाग्यशाली हैं। "कहते हुए सैनिकों को वहां छोड़ कर दुर्गपति आगे के मोर्चों का निरीक्षण करने चल पड़े।
प्रातःकाल होते-होते योगमाया के प्रकट होने की बात समस्त दुर्ग और नगर में फ़ैल गई। यह घटना सभी लोगों की चर्चा का विषय बन गई। रनिवास में भी खबर पहुंची। महारानियों ने भी इस चमत्कार को श्रद्धापूर्वक सुना और रुपावती के कानों में भी यह बात पड़ी। सब ने एक स्वर में लक्खा सामंत के भाग्य की सराहना की। महाराज ने भी अपने विश्वसनीय गुप्तचरों व अधिकारियों द्वारा इस घटना को सुना। उनका भक्त ह्रदय गदगद हो उठा। उन्होंने लक्खा सामंत से सब घटना का वर्णन स्वयं सुनना चाहा। नागरिकों और सैनिकों का उत्साह अपार हो गया। उन्हें दैवी शक्ति की सहायता से विजय में किंचित मात्र संदेह न रहा।

"गरीबपरवर ! आप मुझ नाचीज के खातिर अपने बाल-बच्चों, सल्तनत, सिपाहियों और रियाया को बर्बाद न कीजियेगा। हुजूर इंसान नहीं खुदा के पैगम्बर हैं। ऐसी मिसाल तो दुनिया की तवारीख में न सुणने में आई न देखने को। बहादुर कौमें तो बहुत है लेकिन जबान की इतनी पाबंदी और गरीबों पर इतना रहम तो राजपूतों के सिवा और कहीं नज़र नहीं आता। खुदा की मेहरबानी से इस वक्त फतह हो गई तो जिंदगीभर हुजूर और हुजूर की औलाद को दिल्ली का बादशाह बनाने की कोशिश करता रहूँगा। असल शहंशाह तो हुजूर हैं। जो बेगुनाहों और गरीबों को पनाह न दे वह काहे का सुल्तान और काहे का शहंशाह। हुजूर आपको मेरे सर की कसम है मेरे लिए इतना_। "
कहते-कहते मंगोल सरदार पीर मौहम्मद की वाणी गदगद हो उठी और आँखों से अविरल जल वर्षा होने लगी।
"सरदार! सूर्य ठंडा और चन्द्रमा उष्ण हो सकता है, पृथ्वी अपनी सहिष्णुता और सागर गंभीरता त्याग सकते हैं पर हमीर अपना निश्चय नहीं त्याग सकता। ईश्वर का विधान बदल सकता है, काल की गति बदल सकती है पर हमीर का वचन नहीं बदल सकता।
पृथ्वी राज का गौरव और चौहान कुल की मर्यादा हमीर के हाथों नष्ट नहीं होने पायेगी। शरणागत को अभयदान देना राजपूत का पुनीत कर्तव्य है और कर्तव्य पालन में परिणाम नहीं देखा जा सकता। राजपूत ने एक बार जिस शरणागत को अभयदान दे दिया उसका स्वयं ब्रह्मा भी बाल बांका नहीं कर सकते। सुलतान अलाउद्दीन की सेना बड़ी होगी पर उसने राजपूत का हाथ अभी देखा नहीं है, राजपूत की तलवार के स्वाद को अभी चखा नहीं है। सरदार! तुम निर्भीक होकर आनंदपूर्वक यहां रहो, हमीर के जीते-जी तुम्हारी ओर कोई आँख उठा कर भी नहीं देख सकता। हमीर का हठ दृढ है, रणतभंवर का दुर्ग दृढ है और भगवान भोलेनाथ का विधान दृढ है। इन्हे कई हिला नहीं सकता।
यह कह कर फिर महाराज हम्मीर राव "ओम नमः शिवाय" का मंत्र गुनगुनाने लग गए।
"दुर्गपति ने मुझे कुछ कहा, वह वास्तव में ही अद्भुत है। भगवान भोलानाथ ने ही माँ को हमारी रक्षा के लिए भेजा था। हम वास्तव में ही भाग्यशाली हैं। क्यों,बोलते क्यों नहीं लक्खा जी।"
"हाँ महाराज!" कहकर लक्खा ने सिर नीचा कर लिया। हम्मीर ने फिर मंगोल सरदार की और देखते हुए कहा-"सरदार ! हम्मीर का हठ दृढ है, रणतभंवर का दुर्ग दृढ़ है क्योंकि उन पर माँ भगवती का दृढ हाथ है।"
फिर महाराज "ओम नमः शिवाय" का मंत्र गुनगुनाने लग गए। इतने में उन्हें मांडदे के आहत होने की घटना याद आई। अब तक लगभग तीस व्यक्ति इस प्रकार अज्ञात बाण से हताहत हो चुके थे। बाण लगने के भय से सैनिक दुर्ग की दीवार के ऊपर सिर निकालते हिचकिचाते थे। दुर्ग और नगर में इस अज्ञात बाण की घटना से तरह-तरह की चर्चाएं चल उठी थीं। दृढ़ में आतंक सा छाया रहता था। रनिवास तक में इस बाण ने बड़ी महारानी जी की प्रिय दासी मांडदे को भी आहत कर दिया था,अतएव अब दुर्ग में किसी का भी जीवन सुरक्षित नहीं था। न इस बाण को चलाने वाले का किसी को कुछ पता था और न कोई यह जानता था कि यह बाण कहाँ से और किस प्रकार चलाया जाता था। प्रत्येक बाण तीन हाथ लम्बा और शूलाकार होता था। उसे कोई भीमकाय दैत्य, दानव या मानव चलाता था या वह किसी यन्त्र से चालित होता था, इस रहस्य को भी अब तक कोई नहीं समझ सका था।

महाराज हम्मीर ने एक पान का बीड़ा मंगवाया और सामंतों के सामने रखते हुए कहा-"जो सामंत इस बाण के रहस्य को मालुम करके, उसके चलाने वाले का वध करने का सामर्थ्य रखता हो, वह इस बीड़े को उठाकर चबा जाए।"
सब एक दूसरे का मुंह देखने लगे। किसी को भी इस दुष्कर कार्य को करने का साहस नहीं हुआ थोड़े समय के लिए दरबार में सन्नाटा छा गया महाराज कुछ कहने ही वाले थे कि लक्खा अपने स्थान से खड़ा हुआ। उसने आगे बढ़ कर पान को उठा लिया। "शंकर भगवान की जय, हठी हम्मीर महाराज की जय" कह कर महाराज का अभिवादन किया और पान का बीड़ा मुंह में रख लिया।

महाराज ने प्रसन्न मुद्रा में लक्खा की ओर देखा और कहा-"शंकर भगवान और माँ भगवती दुर्गा तुम्हारी सहायता करेंगे।

लक्खा ने इस कार्य के लिए दो दिन का समय माँगा और महाराज से अभिवादन कर के दरबार से बाहर आ गया। वहां से वह सीधा रनिवास में गया। छत पर मांडदे की स्थिति में अपने अनुचर को खड़ा किया। जिस रूप में और जिस स्थान पर मांडदे को बाण लगा था, उस स्थिति का अध्ययन किया। फिर महल की छत पर घूमकर चारों ओर देखा और मन-ही-मन कुछ अनुमान लगाया। उसके चेहरे पर प्रसन्नता की एक रेखा दौड़ गई। उसने अपने मष्तिष्क में बाण चलाने के स्थान का रहस्य मालूम कर लिया। फिर उस बाण को हाथ में लिया, उसे हथेली पर रख कर तौला, उसके फल और सिरे को कई बार देखा और अपने धनुष पर चढ़ा कर उसकी लम्बाई का अनुमान लगाया। अब उसने बाण चलाने वाले की शक्ति, आकार और धनुर्विद्या में उसकी निपुणता का भी अनुमान लगा लिया था। "इस बाण को चलाने वाला कोई मनुष्य नहीं, दानव या देवता ही हो सकता है। बाण को अनुचर के हाथ में देते हुए उसने कहा।
अब उसके विश्राम का समय आया। नित्य कर्म से वह पहले ही निवृत हो चुका था। उसने शीघ्रता से भोजन किया और वह अपनी कोठरी में जाकर बिस्तर पर लेट गया। रात की नींद और थकावट होते हुए भी उसको नींद नहीं आ रही थी। ज्यों ही वह आँखें मूंदता, रुपावती की आकृति उसके सामने आ जाती। आज रुपावती के प्रति उसका वासनामय प्रेम श्रद्धा और सम्मान में परिवर्तित हो गया था। "रुपावती वास्तव में ही देवी है" उसने मन ही मन गुनगुनाया। उसे रोमांच हो आया। रुपावती की स्मृति ने उसे विव्हल कर दिया। उसका वश पड़ता तो वह रुपावती को उसी समय रनिवास में से कंधे पर बैठा कर वहां ले आता, फिर उसकी पूजा और आरती करता, उसे गले लगाता और न मालूम और क्या-क्या करता। दूसरे ही क्षण उसे अपने प्रतिज्ञा का ध्यान आया। उस मनुष्य का वध करना कोई हंसी-खेल नहीं है।" उसने सोचा यह कार्य उसे अत्यंत दुष्कर जान पड़ा। उससे कहीं बड़े अधिकारी, सामंत और योद्धा बैठे थे, फिर उसने ही उस बीड़े को क्यों उठाया। वह अपनी भावुकता पर खीज उठा। गत रात्रि की वीरता के लिए की गई उसकी प्रशंसा के कारण उसने अपने मस्तिष्क का संतुलन खो दिया और व्यर्थ ही एक दुष्कर कार्य का भार उसने अपने सिर पर ले लिया था। उसने करवट बदली और फिर रुपावती की स्मृति उसके ध्यान में आ गई।

आज चन्द्रमा भी तो एक घडी देर से अस्त होगा। उसने लेटे-लेते ही दो-चार बड़ी सी गलियां चन्द्रमा को दे दीं। फिर उसके ध्यान में आया कि प्रतिज्ञा पालन के लिए कितना कम समय माँगा है यदि एक महीने का समय मांगता तो रुपावती से इतना शीघ्र ही वियोग नहीं होता। पर अब बाण हाथ से छूट चुका था। वह अब महाराज के पास जाकर यह भी तो नहीं कह सकता था कि, मैं अभी बच्चा हूँ, यह दुष्कर प्रतिज्ञा मेरे से पूर्ण नहीं होगी। प्रतिज्ञा के धनी हठी हम्मीर के सम्मुख इस प्रकार के कायरतापूर्ण वचन बोलने का उसे कैसे साहस हो सकता था। उसकी स्वयं की भी कुल मर्यादा थी। अब तक उसने वीरता से नाम और सम्मान कमाया था। उस पर अब कालिख कैसे पोती जा सकती थी। फिर उसने करवट बदली और रुपावती का दैवी स्वरूप उसके स्मृति पटल पर आकर अंकित हो गया। उसने कल्पना का सुख लेने के लिए लेटे-लेटे ही रुपावती को अपने ह्रदय से लगाने के लिए दोनों हाथ फैलाये। इतने में पानी की झारी लेकर आते हुए अनुचर की उसकी खटिया के ठोकर लग जाने के कारण खटिया हिली और उसकी विचार शृंखला वहीँ समाप्त हो गई। फिर उसने आँखें बंद की। उसका अन्तःप्रदेश फिर प्रणय और कर्त्तव्य के संघर्ष से उद्वेलित हो उठा। अंत में उसने कुछ निश्चय किया और अब उसकी आँख लग गई।

रात्री हुई और लख्खा पिछोली बुर्ज पर पहुँच गया आज फिर वह चंद्रमा के अस्त होने का इन्तजार करने लगा,आखिर चन्द्रमा के अस्त होते ही जौहर कुण्ड की और से आती हुई एक आकृति उसे नजर आई वह समझ गया कि रुपावती आ रही है,थोड़ी देर में रुपावती उसके सामने थी | "आज देवी की कृपा देर से हुई ?" "भक्त के हृदय में भक्ति की कमी आ गयी होगी |" कहते हुए रुपावती बुर्ज की सीढियाँ चढ़ गयी | फिर दो प्रेमी मन,वचन और कर्म से एक हो गए | आज लख्खा के व्यवहार में कुछ विचित्रता सी थी | कोई बात उसकी जुबान तक आती और रुक जाती | वह रुपावती को एक क्षण भी अलग होने देना नहीं चाह रहा था |

"अब शुभ कार्य के लिए विलम्ब क्यों करते हो नाथ? जिस प्रकार महाराज हम्मीर का हठ दृढ है, रणत भंवर का दुर्ग दृढ़ है उसी प्रकार आपकी प्रतिज्ञा भी दृढ़ होनी चाहिए स्वामी।"
"देवी का आग्रह दृढ है तो प्रतिज्ञा भी दृढ़ होगी रूपा।"
रूपावती ने लक्खा की आरती की, अपने हाथ से उसके शस्त्र बांधे, भगवान शंकर से प्रार्थना की और चरण छू कर उसे विदाई दी। लक्खा लटकते हुए रस्से की और गया। उसने एक बार आँख भर रूपावती की गंभीर मुख को देखा और तुरंत ही रस्सा पकड़ कर नीचे झुक गया।
रूपावती ने मशाल पर तेल सींचा और दुर्ग के नीचे अन्धकार में अपने प्राणनाथ की विलीन होती हुई आकृति को देखने के लिए दीवार से ऊपर सिर निकाला।
थोड़ी देर पश्चात बंधा हुआ रस्सा हिला। रूपावती ने अपनी तलवार संभाली और मशाल उधर कर के देखा तो लक्खा बुर्ज की दीवार पर चढ़ता हुआ दिखाई दिया।
"क्यों नाथ लौट कैसे आये?"
"कटार भूल गया था उसे लेने आया हूँ।"
"ओह मैं आपके कटार बांधना भूल गई थी।" यह कह कर रूपावती ने उसकी कमर में कटार बाँध दी। लक्खा ने फिर रूपावती को अपने ह्रदय से लगाया और रस्से के सहारे वह वह नीचे झुक गया।
थोड़ी देर के पश्चात वह फिर रस्से के सहारे बुर्ज पर आ गया। इस बार कहा-"तरकस में बाण कम हैं सो बाण लेने आया हूँ।"
रूपावती ने कहा- नाथ शीघ्रता कीजिये। यदि चन्द्रमा अस्त हो गया तो आपको अन्धकार में नीचे जाने के लिए मार्ग मिलना कठिन हो जायेगा।
लक्खा तीसरी बार नीचे झुक गया। उसने आगे पैर बढ़ाना चाहा पर ह्रदय उसका पीछे बंधा हुआ ही रह गया था। इस बार उसने कुछ निश्चय किया और फिर पिछोली बुर्ज की दीवार पर चढ़ आया। इस बार रूपावती ने कुछ क्रोध मिश्रित स्वर में पूछा-" आप फिर क्यों आये हैं?
लक्खा के मन में आया क़ि इस बार सच्ची-सच्ची बात कह दूं- मैं तुम्हें लेने के लिए आया हूँ। हम यहाँ से भाग चलें और आनंद से कहीं दिन बिताएंगे।
पर इस बार रूपावती की रौद्र मूर्ति देख कर उसे यह बात कहने का साहस नहीं हुआ। इस समय सचमुच रूपावती साक्षात दुर्गा के सामान रौद्र लग रही थी।
लक्खा ने अपने मन ही मन बात छिपाते हुए कहा- "रूपा ! मैं तुम्हें यही पूछने आया हूँ क़ि आज मैं यदि काम आ गया तो तुम पीहर किस प्रकार जाओगी?"
रूपा ने स्वर में रूखापन लाते हुए कहा- "मैं पीहर क्यों जाउंगी, यहीं सती हो जाउंगी।"
"रूपा ! हाथ आगे बढ़ाते हुए लक्खा ने कहा।
"सावधान अब आप मुझे छूना मत। आप अपना कर्तव्य पालन कीजिये और मैं अपना_।" कहती हुई रूपावती बुर्ज से नीचे जाने लगी।"

लक्खा का सिर लज्जा से झुक गया। उसे इस परिस्थितिजन्य दुर्बलता पर क्रोध आ गया। उस जैसा सामंत यह दुर्बलता बताये। उसे एक धक्का सा लगा और वह फ़ौरन दीवार पर चढ़कर नीचे झुकने लगा "नाथ ठहरिये !" रूपावती ने लौटते हुए कहा।
"क्यों ?" लक्खा ने पूछा।
"आप नीचे उतरकर अपना दुपट्टा फैलाइए। मैं ऊपर से एक ऐसी वस्तु गिराउंगी जिससे निश्चित रूप से आपकी विजय होगी। एक सिद्ध मणि आपको भेंट करुँगी।" यह कहती हुई रूपावती हंस पड़ी।

भावनाओं के तीव्र द्वंद्व के कारण लक्खा का मन कुछ भी निश्चित नहीं कर सका। वह तंत्र द्वारा चालित पुतले के सामान अपने कमरबंध को दोनों हाथों से फैला कर बुर्ज के नीचे खड़ा हो गया।
ऊपर से कोई भारी सी वस्तु दुपट्टे पर आकर गिरी। लक्खा पहले सहसा चौंका, फिर क्षण भर उस वस्तु को देखता रहा। क्षणभर उसने कुछ सोचा और दुपट्टे से उस वस्तु को ह्रदय से बांध कर वह शीघ्रतापूर्वक चल पड़ा।

उसके अभ्यस्त पैरों, बलिष्ठ हाथों और दृढ निश्चय ने उसे थोड़ी देर में रणत्या की डूंगरी (रण की डूंगरी) की पूर्वी ढाल पर लाकर खड़ा कर दिया। उसकी कमर का दुपट्टा एक कटीली झाड़ी में उलझ गया। वह उसे निकालने के लिए रुका। सहसा उसे किसी के आने की आहट सुनाई पड़ी। वह झट से एक चट्टान की ओट में छिप गया। थोड़ी देर में उसे मशाल के क्षीण प्रकाश में दो सिर रणत्या की डूंगरी के शिखर पर हिलते हुए दिखाई दिए। वह भी सांस ऊपर खींच कर, हाथों, पैरों के सहारे, बिना आहट किये हुए ऊपर की ओर चढ़ने लगा। अंत में वह एक ऐसी चट्टान पर पहुंच गया जहाँ उसे वे दोनों व्यक्ति नहीं देख सकते थे पर वह दोनों को देख सकता था। शिखर पर खड़े दोनों व्यक्तियों ने मशाल बुझा दी और बैठ कर किसी की प्रतीक्षा करने लगे।

प्राची में अरुणोदय हुआ। सघन अन्धकार के स्थान पर प्रकाश की हल्की आभा व्याप्त हो गई। लक्खा ने देखा, शिखर पर एक विशालकाय व्यक्ति खड़ा हुआ है। उसने रणत भंवर के दुर्ग की ओर मुंह किया, फिर दाहिना घुटना भूमि पर टेक कर बायां घुटना ऊपर की ओर करके धनुष उठाया; धनुष की एक नोंक भूमि पर रख कर दाहिने घुटने से दबाया और उस पर एक बाण चढ़ा कर उसे कान तक खींचा और फिर वापिस उतार कर रख दिया। फिर उसने प्राची में देखा और कुछ गुनगुना कर आराम की स्थिति में बैठ गया। अब लक्खा उसके मंतव्य को भी समझ गया। वह उदित होते हुए सूर्य को अर्ध्य देते हुए महाराज का वध करना चाहता था।

दूसरे ही क्षण रणत भंवर के सबसे बलिष्ठ हाथों ने भी अपना धनुष संभाला; उस पर एक अर्द्ध-चंद्राकार बाण रखा; उसे कान तक खींचा और वापिस उतारकर रख दिया। यद्यपि लक्खा वीर था, बलिष्ठ था पर तो भी उसका ह्रदय धक-धक उछाल रहा था। भय, आशंका, उत्तेजना, प्रसन्नता, आदि मिश्रित भावों के वेग से उसके हाथों में कंपकपी आने लगी। उसने अपने आत्म बल को बटोरा, इक्कीस बार "विघ्नहरण गणेशाय: नमः" का जाप किया, भगवान शंकर का ध्यान किया, अपने ह्रदय पर बंधी हुई वस्तु पर हाथ फेरा और फिर धनुष पर बाण चढ़ाया, प्रत्यंचा को कान तक खींचा और संधान करके छोड़ दिया। उस विशालकाय व्यक्ति का सिर कट कर ज़मीं पर आ गिरा। लक्खा प्रसन्नता से उछल पड़ा। थोड़ी देर तक उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। वह पाषाणवत वहीँ खड़ा देखता रहा। इतने में दूसरा व्यक्ति वहां से भाग खड़ा हुआ। तब लक्खा लपक कर शिखर पर गया। उसने भैंसे के सिर जैसा विशाल सिर उठाया, कटी हुई गर्दन को मिट्टी और घास पर रगड़ कर रक्त को सुखाया, शूलाकार बाणों और विशाल धनुष को उठाया और वह तत्काल वहां से चल पड़ा। उसके चेहरे की क्षणिक प्रसन्नता, फिर गंभीरता और विषाद में बदल गई।
सूर्योदय होते-होते लक्खा पिछोली बुर्ज पर पहुँच गया था। उसने तत्काल ही वहां पड़ी हुई वस्तुओं को ठिकाने लगाया। अपने अनुचर को, जो "सावधान" कहने के लिए बुर्ज के नीचे बैठा दिया गया था, जगाया और सूर्य को अर्ध्य देकर नीचे उतरते हुए महाराज हम्मीर राव के चरणों पर कटा हुआ विशाल सिर, शूलाकार बाण और विशाल धनुष को रख दिया।
"तुम्हारे ही जैसे श्रेष्ठ वीरों के कारण हम्मीर के दृढ हठ और रणत भंवर के दृढ दुर्ग को कोई तोड़ नहीं सकता लक्खाजी।" कहते हुए महाराज ने रक्त से लथपथ लक्खा को अपने गले लगा लिया।
"मैं आपका अपराधी हूँ महाराज !"
"कैसा अपराध ?"
"मैंने दुर्ग के अनुशासन को भंग किया; आपकी अवज्ञा की और मिथ्या भाषण किया।"
"मैं तुम्हारी बात का तात्पर्य समझा नहीं लक्खजी।"
और लक्खा ने आद्योपांत बुर्ज की प्रणय लीला, देवी के प्रादुर्भाव और अंत में मोह लिप्त होने की कहानी महाराज को सुना दी। उसने अपने हृदय पर दुपट्टे से बंधा हुआ रूपावती का सिर महाराज के सम्मुख रख दिया।
महाराज हम्मीर ने रूपावती के कटे शीश को देखा। क्षण भर में ही उनकी मुखाकृति गंभीर हो गई। उन्होंने अपने नेत्र बंद कर लिए। उनके हृदय में कर्त्तव्य के दृढ़ निश्चय की एक भाव-तरंग उठी, आँखों के मार्ग से दो मोतियों के रूप में वह प्रकट हुई और महाराज के कपोलों को स्पर्श करते हुए उसने रूपावती के उज्जवल भाल को धोकर और भी अधिक दैदीप्यमान बना दिया।
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