शनिवार, 8 जुलाई 2017

****भाई आलम सिंघ जी शहीद****

भाई आलम सिंघ जी , चौहान राजपूत घराने से संबंध रखते थे।
सूरज प्रकाश ग्रंथ,भट्ट बहियों,गुरु कीआं साखीयां आदि रचनाओं में इसका स्पष्ट उल्लेख है ।
"आलम सिंघ धरे सब आयुध,जात जिसी रजपूत भलेरी ।
खास मुसाहिब दास गुरु को,पास रहै नित श्री मुख हेरी ।
बोलन केर बिलास करैं, जिह संग सदा करुणा बहुतेरी ।
आयस ले हित संघर के,मन होए आनंद चलिओ तिस बेरी ।"
(सूरज प्रकाश ग्रंथ- कवि संतोख सिंघ जी..रुत 6,अंसू 39,पन्ना 2948)

भाई आलम सिंघ जी का जन्म दुबुर्जी उदयकरन वाली,जिला स्यालकोट (अब पाकिस्तान) में सन् 1660 हुआ,जो उनके पूर्वजों ने सन् 1590 में बसाया था ।
भाई आलम सिंघ जी के पिता राव (भाई)दुर्गा दास जी, दादा राव (भाई)पदम राए जी, परदादा राव (भाई)कौल दास जी ,सिख गुरु साहिबान के निकटवर्ती सिख व महान योद्धा थे ।
भाई आलम सिंघ जी के दादा के भ्राता राव (भाई ) किशन राए जी छठे गुरु श्री गुरु हरगोबिन्द साहिब जी द्वारा  मुगलों के खिलाफ लड़ी करतारपुर की जंग में 27 अप्रैल 1635 को शहीद हुए थे ।
भाई आलम सिंघ जी सन् 1673 में 13 वर्ष की आयु में अपने पिता राव (भाई) दुर्गा दास जी के साथ गुरु गोबिन्द सिंघ जी के दर्शन करने आए ।
गुरु जी ने उनको अपने खास सिखों में शामिल कर लिया । वो इतने फुर्तीले थे कि गुरु जी ने उनका नाम 'नचणा' रख दिया था ।
फरवरी 1696 में मुगल फौजदार हुसैन खान ने जब पहाड़ी राजपूत रियासत गुलेर पर आक्रमण किया तो वहां के राजा गज सिंह ने गुरु गोबिन्द सिंघ जी से मदद मांगी । गुरु जी ने अपने चुनिंदा सेनापतियों के नेतृत्व मे सिख फौज भेजी । राजपूतों व सिखों की संयुक्त सेना ने मुगल फौज को बुरी तरह परास्त किया लेकिन इस युद्ध में भाई आलम सिंघ जी के ताऊ जी के 2 पुत्र कुंवर (भाई) संगत राए जी व कुंवर भाई हनुमंत राए जी शहीद हो गए । साथ में राव भाई मनी सिंघ जी (पंवार) के भाई राव (भाई) लहणिया जी भी शहीद हुए ।
19 अगस्त 1695 को लाहौर के गवर्नर दिलावर खान के पुत्र रुस्तम खान ने आनन्दपुर साहिब पर हमला किया तो भाई आलम सिंघ जी व भाई उदय सिंघ जी के नेतृत्व में सिख फौज ने इतनी जोर से बोले सो निहाल सत श्री अकाल के जयकारे बोले और नगारे बजाए कि रुस्तम खान व मुगल फौज भयभीत होकर बिना लड़े भाग गई ।
23 जून 1698 को गुरु गोबिन्द सिंघ जी कटोच इलाके में शिकार खेलने गये तो दो कटोच राजाओं बलिया चंद व आलम चंद ने गुरु जी के साथ कम फौज देख कर उन पर हमला कर दिया लेकिन मुट्ठी भर सिंघों ने इनको बुरी तरह रौंद दिया । राजा आलम चंद की बांह भाई आलम सिंघ जी चौहान ने काट डाली व राजा बलिया चंद भी भाई उदय सिंघ जी पंवार के हाथों बुरी तरह घायल हुआ ।
गुरु गोबिन्द सिंघ जी द्वारा जुल्म के खिलाफ लड़े गए हर युद्ध में भाई आलम सिंघ जी की मुख्य भूमिका रही और बड़ी बात ये भी है कि वो गुरु गोबिन्द सिंघ जी के शस्त्र विद्या के उस्ताद भाई बज्जर सिंघ जी (राठौड़) के दामाद थे ।
भाई आलम सिंघ जी के समस्त परिवार ने गुरु जी द्वारा मुगलों के खिलाफ युद्धों में मोर्चा संभाला व समय समय पर शहीदीयां दी ।
भाई आलम सिंघ जी भी अपने एक भ्राता भाई बीर सिंघ जी व अपने दो पुत्रों भाई मोहर सिंघ जी, भाई अमोलक सिंघ जी सहित चमकौर की जंग में 7 दिसंबर 1705 को शहीद हुए ।

भाई आलम सिंघ जी की वंशावली

महाराजा सधन वां (अहिच्छेत्रपुर के महाराजा)
महाराजा चांप हरि
महाराजा कोइर सिंह
महाराजा चांपमान
महाराजा चाहमान (चौहान)
महाराजा नरसिंह
महाराजा वासदेव
महाराजा सामंतदेव
महाराजा सहदेव
महाराजा महंतदेव
महाराजा असराज
महाराजा अरमंतदेव
महाराजा माणकराव
महाराजा लछमन देव
महाराजा अनलदेव
महाराजा स्वच्छ देव
महाराजा अजराज
महाराजा जयराज
महाराजा विजयराज
महाराजा विग्रह राज
महाराजा चन्द्र राज
महाराजा दुर्लभ राज
महाराजा गूणक देव
महाराजा चन्द्र देव
महाराजा राजवापय
महाराजा शालिवाहन
महाराजा अजयपाल
महाराजा दूसलदेव
महाराजा बीसलदेव
महाराजा अनहलदेव
महाराजा विग्रह राज
महाराजा मांडलदेव
महाराजा दांतक जी
महाराजा गंगवे
महाराजा राण जी
महाराजा बीकम राय
महाराजा हरदेवल
महाराजा गोल राय
महाराजा गोएल राय
महाराजा गज़ल राय
राव उदयकरन जी
राव अंबिया राय
राव कौल दास
राव पदम राय
राव दुर्गा दास
राव आलम सिंघ जी

लेखक - श्री सतनाम सिंह जी पंवार

रविवार, 23 अप्रैल 2017

मैनपुरी का स्वतंत्रता सेनानी महाराजा तेजसिंह चौहान




#दुख है #मैनपुरी वाले सब भूल गए....
#अतिमहत्वपूर्ण_जानकारी.
#मैनपुरी जिले का इतिहास वीर गाथाओं से भरा पड़ा है। यहां की माटी में जन्मे लालहमेशा गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने के लिए हर सम्भव कोशिश करते रहे। ब्रिटिश राजमें स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यहां की माटी वीर सपूतों के खून से लाल हुई है।पृथ्वीराज चौहान के बाद उनके वंश के वीर देशभर में बिखर गए। उन्हीं में से एक  प्रतापरुद्र् जो की नीमराना से आये थे उन्होंने 1310 ई. में मैनपुरी में सर्वप्रथम चौहान वंश की स्थापनाकी। 1857 में जब स्वतंत्रता आंदोलन की आग धधकी तो महाराजा तेजसिंह की अगुवाई में मैनपुरी में भी क्रांति का बिगुल फूंक दिया गया। तेज सिंह वीरता से लड़े। और अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिए। घर के भेदी की वजह से उन्हें भले ही अंग्रेजों को खदेड़ने में सफलता न मिली हो लेकिन इसमें उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। तेजसिंह ने जीवन भर मैनपुरी की धाक पूरी दुनिया में जमाए रखी।इतिहास गवाह है कि 10 मई 1857 को मेरठ से स्वतंत्रता आंदोलन की शुरूआत हुई, जिसकी आग की लपटें मैनपुरी भी पहुंची। इस आंदोलन से पांच साल पहले ही महाराजा तेजसिंह को मैनपुरी की सत्ता हासिल हुई थी। उन्हें जैसे-जैसे अंग्रेजोंके जुल्म की कहानी सुनने को मिली, उनकी रगों में दौड़ रहा खून अंग्रेजी हुकूमत कोजड़ से उखाड़ फेंकने के लिए खौल उठा और 30 जून 1857 को अंग्रेजी हुकूमत केविरुद्ध तेजसिंह ने आंदोलन का बिगुल फूंक दिया। उन्होंने मैनपुरी के स्वतंत्र राज्य की घोषणा करते हुए ऐलान कर दिया। फिर क्या था राजा के ऐलान ने आग में घी का काम किया और उसी दिन तेजसिंह की अगुवाई में दर्जनों अंग्रेज अधिकारी मौत के घाट उतार दिए गए। सरकारी खजाना लूट लिया गया। अंग्रेजों की सम्पत्ति पर तेजसिंहकी सेना ने कब्जा कर लिया। तेजसिंह ने तत्कालीन जिलाधिकारी पावर को प्राण की भीख मांगने पर छोड़ दिया और मैनपुरी तेजसिंह की अगुवाई में क्रांतिकारियों की कर्मस्थली बन गयी। मगर स्वतंत्र राज्य अंग्रेजों को बर्दाश्त नहीं था। फलस्वरूप 27 दिसम्बर 1857 को अंग्रेजों ने मैनपुरी पर हमला बोल दिया। इस युद्ध में तेजसिंह के 250 सैनिक भारत माता की चरणों में अर्पित हो गए। प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन में तेजसिंह की भूमिका ने क्रांतिकारियों को एक जज्बा प्रदानकर दिया। हालांकि उनके चाचा राव भवानी सिंह ने अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध तेजसिंह का साथ नहीं दिया। फलस्वरूप तेजसिंह अंग्रेजों से लड़ते हुए गिरफ्तार होगए और अंग्रेजों ने उन्हें बनारस जेल भेज दिया। इसके बाद भवानी सिंह को मैनपुरीका राजा बना दिया गया। 1897 में बनारस जेल में ही तेजसिंह की मौत हो गयी।मैनपुरी के इस क्रांतिकारी राजा को उनकी प्रजा की तरफ से शत शत नमन...

आगे का वंशावली--प्रतापरुद्रजी के दो पुत्र हुये१.राजा विरसिंह जू देव जो मैनपुरी में बसे२. धारक देवजू जो पतारा क्षेत्र मे जाकर बसेमैनपुरी के राजा विरसिंह जू देव के चार पुत्र हुये१. महाराजा धीरशाह जी इनसे मैनपुरी के आसपास के गांव बसे२.राव गणेशजी जो एटा में गंज डुडवारा में जाकर बसे इनके २७ गांव पटियाली आदि हैं३. कुंअर अशोकमल जी के गांव उझैया अशोकपुर फ़कीरपुर आदि हैं४.पूर्णमल जी जिनके सौरिख सकरावा जसमेडी आदि गांव हैंमहाराजा धीरशाह जी के तीन पुत्र हुये१. भाव सिंह जी जो मैनपुरी में बसे२. भारतीचन्द जी जिनके नोनेर कांकन सकरा उमरैन दौलतपुर आदि गांव बसे२. खानदेवजू जिनके सतनी नगलाजुला पंचवटी के गांव हैंखानदेव जी के भाव सिंह जी हुयेभावसिंह जी के देवराज जी हुयेदेवराज जी के धर्मांगद जी हुयेधर्मांगद जी के तीन पुत्र हुये१. जगतमल जी जो मैनपुरी मे बसे२. कीरत सिंह जी जिनकी संतति किशनी के आसपास है३. पहाड सिंह जी जो सिमरई सहारा औरन्ध आदि गावों के आस पास बसे.

गुरुवार, 23 मार्च 2017

"घुड़ला पर्व" की ऐसी सच्चाई जिसे जान आप रह जाएँगे दंग


हिन्दुत्व को बचाने के लिये आपके द्वारा इस सत्य से हिन्दुओं को अवगत कराना आवश्यक है नही तो कालांतर मे अर्थ का अनर्थ हो सकता है !
मारवाड़ में होली के बाद एक पर्व शुरू होता है ,जिसे *घुड़ला पर्व* कहते है
कुँवारी लडकिया अपने सर पर एक मटका उठाकर उसके अंदर दीपक जलाकर गांव में घूमती है और घर घर घुड़लो जैसा गीत गाती है !
अब यह घुड़ला क्या है ?
कोई नहीं जानता है ,
घुड़ला की पूजा शुरू हो गयी
यह भी ऐसा ही घटिया ओर घातक षड्यंत्र है जैसा की अकबर को महान बोल दिया गया !
दरअसल हुआ ये था की घुड़ला खान अकबर का मुग़ल सरदार था और अत्याचारऔर पैशाचिकता मे भी अकबर जैसा ही गंदा पिशाच था ! ज़िला नागोर राजस्थान के पीपाड़ गांव के पास एक गांव है कोसाणा !उस गांव में लगभग 200 कुंवारी कन्याये गणगोर पर्व की पूजा कर रही थी ,वे व्रत में थी उनको मारवाड़ी भाषा में तीजणियां कहते है !
गाँव के बाहर मौजूद तालाब पर पूजन करने के लिये सभी बच्चियाँ गयी हुई थी उधर से ही घुडला खान मुसलमान सरदार अपनी फ़ौज के साथ निकल रहा था ,उसकी गंदी नज़र उन बच्चियों पर पड़ी तो उसकी वंशानुगत पैशाचिकता जाग उठी ! उसने सभी बच्चियों का बलात्कार के उद्देश्य से अपहरण कर लिया , जिस भी गाँव वाले ने विरोध किया उसको उसने मौत के घाट उतार दिया ! इसकी सूचना घुड़सवारों ने जोधपुर के राव सातल सिंह जी राठौड़ को दी ! राव सातल सिंह जी और उनके घुड़सवारों ने घुड़ला खान का पीछा किया और कुछ समय मे ही घुडला खान को रोक लिया , घुडला खान का चेहरा पीला पड़ गया उसने सातल सिंह जी की वीरता के बारे मे सुन रखा था ! उसने अपने आपको संयत करते हुये कहा , राव तुम मुझे नही दिल्ली के बादशाह अकबर को रोक रहे हो इसका ख़ामियाज़ा तुम्हें और जोधपुर को भुगतना पड़ सकता है ? राव सातल सिंह बोले , पापी दुष्ट ये तो बाद की बात है पर अभी तो मे तुझे तेरे इस गंदे काम का ख़ामियाज़ा भुगता देता हुँ ! राजपुतो की तलवारों ने दुष्ट मुग़लों के ख़ून से प्यास बुझाना शुरू कर दिया था , संख्या मे अधिक मुग़ल सैना के पांव उखड़ गये , भागती मुग़ल सैना का पीछा कर ख़ात्मा कर दिया गया ! राव सातल ने तलवार के भरपुर वार से घुडला खान का सिर धड़ से अलग कर दिया ! राव सातल सिंह ने सभी बच्चियों को मुक्त करवा उनकी सतीत्व की रक्षा करी !


इस युद्दध मे वीर सातल सिंह जी अत्यधिक घाव लगने से वीरगति को प्राप्त हुये ! उसी गाँव के तालाब पर सातल सिंह जी अंतिम संस्कार किया गया, वहाँ मौजूद सातल सिंह जी की समाधि उनकी वीरता ओर त्याग की गाथा सुना रही है ! गांव वालों ने बच्चियों को उस दुष्ट घुडला खान का सिर सोंप दिया ! बच्चियो ने घुडला खान के सिर को घड़े मे रख कर उस घड़े मे जितने घाव घुडला खान के शरीर पर हुये उतने छेद किये और फिर पुरे गाँव मे घुमाया और हर घर मे रोशनी की गयी ! यह है घुड़ले की वास्तविक कहानी !
हिन्दु राव सातल सिंह जी को तो भूल गए
और पापी दुष्ट घुड़ला खान को पूजने लग गये ! अब बताओ कैसे हो हिन्दुओं का उद्गार ?
इतिहास से जुडो और सत्य की पूजा करो !
सातल सिंह जी को याद करो घुड़ले खान को जूते मारो ....
कुँवर वीरेन्द्र सिंह शेखावत
प्रदेश अध्यक्ष , अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा युवा राजस्थान



सोमवार, 23 जनवरी 2017

वीर योद्धा कान्हड़देव चौहान




जालौर के वीर शासक कान्हड़देव का नाम आते ही लेखकों की कलमें ठहर जाती है तो पढ़ने वालों के कलेजे सिंहर उठते हैं। कारण यह नहीं कि उसने अपने से कई गुना शक्तिशाली दुश्मन को मात दी और अंत में बलिदान दिया। यह तो राजस्थान की उस समय की पहचान थी। कलम के ठहरने और कलेजों के कांपने का कारण यह था कि कान्हड़देव जैसे साहसी एवं पराक्रमी शासक का अंत ऐसा क्यों हुआ ? क्यों नहीं अन्य शासक उसके साथ हुए, क्यों नहीं सोचा कि कान्हड़देव की पराजय के बाद अन्य शासकों का क्या होगा। शायद डॉ. के.एस. लाल ने अपने इतिहास ग्रंथ 'खलजी वंश का इतिहास' में सही लिखा है कि'पराधीनता से घृणा करने वाले राजपूतों के पास शौर्य था, किंतु एकता की भावना नहीं थी। कुछेक ने प्रबल प्रतिरोध किया, किंतु उनमें से कोई भी अकेला दिल्ली के सुल्तान के सम्मुख नगण्य था। यदि दो या तीन राजपूत राजा भी सुल्तान के विरुद्ध एक हो जाते तो वे उसे पराजित करने में सफल होते।'
डॉ. के.एस. लाल की उक्त टिप्पणी बहुत ही सटीक है। कान्हड़देव की वंश परम्परा के सम्बन्ध में ही उदयपुर के ख्यातिनाम लेखक एवं इतिहासवेता डॉ. शक्तिकुमार शर्मा 'शकुन्त' ने लिखा है कि- 'चाहमान (चौहान) के वंशजों ने यायव्य कोण से आने वाले विदेशियों के आक्रमणों का न केवल तीव्र प्रतिरोध किया अपितु 300 वर्षों तक उनको जमने नहीं दिया। फिर चाहे वह मुहम्मद गजनी हो, गौरी हो अथवा अलाउद्दीन खिलजी हो, चौहानों के प्रधान पुरुषों ने उन्हें चुनौती दी, उनके अत्याचारों के रथ को रोके रखा तथा अन्त में आत्मबलिदान देकर भी देश और धर्म की रक्षा अन्तिम क्षण तक करते रहे।
बस, यही सब कुछ हुआ था इस चौहान वं श के यशस्वी वीर प्रधान पुरुष जालौर के राजा कान्हड़देव के साथ भी। पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु के बाद चौहानों की एक शाखा रणथंभौर चली गई तो दूसरी शाखा नाडौल और नाडौल से एक शाखा जालौर में स्थापित हो गई। कीर्तिपाल से प्रारम्भ हुई यह शाखा समरसिंह, उदयसिंह, चा चकदेव, सामन्तसिंह से होती हुई कान्हड़देव तक पहुँची। किशोरावस्था से अपने पिता का हाथ बांटने के निमित्त कान्हड़देव शासन र्यों में रुचि लेना शुरूकर दिया था। संवत 1355 में दिली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने गुजरात जाने के लिए मारवाड़ का रास्ता चुना। कान्हड़देव को इस समय तक अलाउद्दीन के मनसूबे का पता लग चुका था। वह अपने इस अभिमान के तहत सोमनाथ के मन्दिर को तोड़ना चाहता था। उसने कान्हड़देव को खिलअत से सुशोभित करने का लालच भी दिया मगर वह किसी भी तरह तैयार नहीं हुआ और सुल्तान के पत्र के जवाब में पत्र लिखकर साफ-साफ लिख भेजा-'तुम्हारी सेना अपने प्रयाण के रास्ते में आग लगा देती है, उसके साथ विष देने वाले व्यक्ति होते हैं, वह महिलाओं के साथ अभद्र व्यवहार करती है, ब्राह्मणों का दमन करती है और गायों का वध करती है, यह सब कुछ हमारे धर्म के अनुकूल नहीं है, अत: हम तुम्हें यह मार्ग नहीं दे सकते हैं।”
कान्हड़देव के इस उत्तर से अलाउद्दीन खिलजी का क्रोधित होना स्वाभाविक था। उसने समूचे मारवाड़ से निपटने का मन बना लिया। गुजरात अभियान तो उसने और रास्ते से पूरा कर लिया लेकिन वह कान्हड़देव से निपटने की तैयारी में जुट गया और अपने सेनापति उलुग खां को गुजरात से वापसी पर जालौर पर आक्रमण का आदेश दिया।उलुगखां अपने सुल्तान के आदेशानुसार मारवाड़ की और बढ़ा ओर सर्वप्रथम सकराणा दुर्ग पर आक्रमण किया। सकाराणा उस समय कान्हड़देव के प्रधान जेता के जिम्मे था। द्वार बन्द था। मुस्लिम सेनाओं ने दुर्ग के बाहर जमकर लूटपाट मचाई, लेकिन यह अधिक देर नहीं चली और जेता ने दुर्ग से बाहर निकलकर ऐसा हमला बोला जो उलुगखां की कल्पना से बाहर था, उसके पैर उखड़ गये और भाग खड़ा हुआ। जेता मुस्लिम सेना से सोमनाथ के मन्दिर से लाई पांच मूर्तियां प्राप्त करने में सफल रहा। इतिहास में अब तक इस युद्ध पर अधिक प्रकाश नहीं डाला गया है लेकिन गुजरात लूटनेवाली सुल्तान की सेना को पराजित करना आसान काम नहीं हो सकता था, अत: निश्चित ही जालौर विजय से पूर्व यह युद्ध कम नहीं रहा होगा। स्मरण रहे कि इस युद्ध में सुल्तान का भतीजा मलिक एजुद्दीन और नुसरत खां के भाई के मरने का भी उल्लेख है।
इस पराजय के बाद 1308 ई. में. अलाउद्दीन ने कान्हड़देव को अपने विश्वस्त सेनानायक व कुशल राजनीतिज्ञ के द्वारा दरबार में बुलाया, बातों में आ गया और वह चला भी गया। जब पूरा दरबार लगा था, अलाउद्दीन ने अपने आपको दूसरा सिकन्दर घोषित करते हुए कहा कि भारत में कोई भी हिन्दू या राजपूत राजा नहीं है जो उसके सामने किंचित् भी टिक सके। कान्हड़देव को यह बात खटक गई, उसका स्वाभिमान जग उठा, उसने तलवार निकाल ली और बोल पड़ा-"आप ऐसा न कहें, मैं हूँ, यदि आपको जीत नहीं सका तो युद्ध करके मर तो सकता हूँ, राजपूत अपनी इस मृत्यु को मंगल-मृत्यु मानता है।'

यह कह कान्हड़देव अलाउद्दीन खिलजी का दरबार छोड़कर वहाँ से चल पड़ा और जालौर आ गया। सुल्तान ने कान्हड़देव के इस व्यवहार को बहुत ही बुरा माना और 1311 ई. में तुरन्त दंड देने के लिए जालौर की ओर अपनी सेना भेजी। डॉ. के.एस. लाल का कहना है कि राजपूतों ने शाही पक्षों को अनेक मुठभेड़ों में पराजित किया और उन्हें अनेकबार पीछे धकेल दिया। उन्होंने यह भी माना कि जालौर का युद्ध भयानक था और संभवत: दीर्घकालीन भी। गुजराती महाकाव्य 'कान्हड़दे प्रबन्ध' के अनुसार संघर्ष कुछ वर्षों तक चला और शाही सेनाओं को अनेक बार मुँह की खानी पड़ी। इन अपमान जनक पराजयों के समाचारों ने सुल्तान को उतेजित कर दिया और उसने अनुभवी मलिक कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में एक शक्तिशाली सेना भेजी। सुल्तान की सेना का जालौर से पूर्व ही सिवाणा के सामंत सीतलदेव ने सामना किया। दोनों के बीच ऐसा युद्ध हुआ जिसकी कलपना संभवत: सुल्तानी सेना नायकों के मस्तिष्क में थी भी नहीं। यही कारण था कि एक बार पुन: पराजय झेलनी पड़ी और वहाँ से दूर तक भागना पड़ा। सुल्तान को ज्यों ही पुन: पराजय का समाचार मिला, कहते हैं कि वह स्वयं इस बार पूरी शक्ति के साथ जालौर पर चढ़ आया।
अब तक सुल्तान को यह आभास अच्छी तरह हो गया था कि युद्ध में रणबांकुरे राजपूतों को पराजित करना कठिन ही नहीं असम्भव है। परिणाम स्वरूप अब सुल्तान की ओर से कूटनीतिक दांव-पेच शुरू हो गये और दुर्ग के ही एक प्रमुख भापला नामक व्यक्ति को प्रचूर धन का लालच देकर अपनी ओर मिला लिया। भापला ने दुर्ग के द्वार खोल दिये और मुस्लिम सेना ने दुर्ग में प्रवेश कर लिया। दुर्ग में तैयारियां पूर्ण थी। ज्यों ही सुल्तान की सेना का प्रवेश हुआ, अन्दर राजपूतों महिलाएं जौहर करने के लिए आगे बढ़ी तो पुरुष भूखे शेरों की तहर टूट पड़े। घमासान छिड़ गया। संख्या में राजपूत कम अवश्य थे लेकिन युद्ध को देखकर ऐसा लग रहा था मानो हजारों की सेना आपस में भिड़ रही हों। यहाँ यदि यह कहा जाए तो अतिश्योति नहीं होगी कि मुट्ठीभर राजपूतों ने पुन: यह बता दिया कि वे मर सकते हैं लेकिन हारते नहीं। देखते ही देखते जालौर के दुर्ग में मरघट की शान्ति पसर गई। 18 वर्ष का संघर्ष समाप्त हो गया। कान्हड़देव का क्या हुआ, इतिहास के स्रोत मौन है लेकिन जालौर का पतन हो गया और साथ ही उस शौर्य गाथा को भी विराम मिल गया जिसका प्रारम्भ चौहान वंशीय वीर-पुत्र कान्हड़देव ने किया था।
अलाउद्दीन को जालौर-विजय की खुशी अवश्य थी, लेकिन उसने यह समझने में किंचित् भी भूल नहीं की कि राजपूताने को जीतना कठिन है। यही कारण है कि इस विजय के उपरांत उसने यहाँ के राजपूत शासकों के संग मिलकर चलने में ही अपनी भलाई समझी और फिर कोई बड़ा अभियान नहीं चलाया। स्वयं डॉ. के.एस. लाल ने अपनी पुस्तक 'खलजी वंश का इतिहास' के पृष्ठ 114 पर लिखा है.राजपूताना पर पूर्ण आधिपत्य असंभव था और वहाँ अलाउद्दीन की सफलता संदिग्ध थी।" अपनी इस बात को स्पष्ट करते हुए डॉ. लाल लिखते हैं कि-'राजपूताना में सुल्तान की विजय स्वल्पकालीन रही, देशप्रेम और सम्मान के लिए मर मिटनेवाले राजपूतों ने कभी भी अलाउद्दीन के प्रांतपतियों के सम्मुख समर्पण नहीं किया। यदि उनकी पूर्ण पराजय हो जाती तो वे अच्छी तरह जानते थे कि किसी प्रकार अपमानकारी आक्रमण से स्वयं को और अपने परिवार को मुक्त करना चाहिए, जैसे ही आक्रमण का ज्वार उतर जाता वे अपने प्रदेशों पर पुन: अपना अधिकार जमा लेते। परिणाम यह रहा कि राजपूताना पर अलाउद्दीन का अधिकार सदैव संदिग्ध ही रहा। रणथम्भौर, चित्तौड़ उसके जीवनकाल में ही अधिपत्य से बाहर हो गये। जालौर भी विजय के शीघ्र बाद ही स्वतन्त्र हो गया। कारण स्पष्ट था, यहाँ के जन्मजात योद्धाओं की इस वीर भूमि की एक न एक रियासत दिल्ली सल्तनत की शक्ति का विरोध हमेशा करती रही, चाहे बाद में विश्व का सर्वशक्तिमान सम्राट अकबर ही क्यों न हो, प्रताप ने उसे भी ललकारा था और अनवरत संघर्ष किया था।
(लेखक – तेजसिंह तरुण “राजस्थान के सूरमा” )

मंगलवार, 15 नवंबर 2016

सम्बन्धों की फुहारें - भाटी नीम्बा और रतनू भीमा

मारवाड़ के चाणक्य कहे जाने वाले भाटी गोयन्ददास के दादा की कथा है यह, उनका नाम नीम्बा था । यह नीम्बा उस समय उचियारड़े नामक ग्राम में रहता था, जहां सोलंकी राजपूतों का आधिक्य था । यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि यह नीम्बा भाटी ‘जैसा’ का पौत्र था ।इस जैसा को राव जोधा अपने संकट काल में इस वचन के साथ अपने साथ जैसलमेर रियासत से लाये थे कि वे राजकीय आय का चौथा हिस्सा उसे देंगे ।

यह ‘जैसा’ जैसलमेर के रावल केहर का पौत्र और राजकुमार कलिकर्ण का पुत्र था व सुप्रसिद्ध हड़बू सांखला का दोहिता था, पर मंडोर हाथ आते ही जोधा ने वचन भुला दिया । परिणामत: जैसा का पुत्र अणदा सामान्य स्थिति में आ गया और उसकी संतान यत्र-तत्र रहने लगी । नीम्बा के इसी सामान्य काल की इस कहानी में संबंधों की वह सुगंध है, जो सामन्ती काल की नैतिकता और प्रतिबद्धता को सामने लाती है ।

इस नीम्बा भाटी के साथ जुड़े पात्र रतनू भीमा के संबंध में भी जानना जरूरी है, रतनू चारणों का सम्बन्ध इतिहास के उस काल से है, जब जैसलमेर की स्थापना नहीं हुई थी और भाटी तन्नौट के शासक थे । तब देवराज नामक भाटी राजकुमार की बारात बिठोड़े (भटिंडा) गई थी ।जहां पूरी बरात को वराहों ने काट डाला था, जान बचाकर भागते राजकुमार का शत्रु पीछा कर रहे थे, उस  संकटकाल में देवायत नामक पुष्करणा ब्राह्मण ने उसे बचाया था । शत्रुओं को उसने राजकुमार को अपना बेटा बताया था और अपने पुत्र रतन के साथ खाना खिलवाकर  उसके शत्रुओं से उसकी प्राण रक्षा की थी ।

उसके बाद  ब्राह्मणों ने उस रतन को जाति से निकाल दिया था, भाटी देवराज ने लौद्रवा के शासक बनते ही इस रतन की शादी चारणों में करवाकर उसे अपना सम्मानित प्रोलपात बना दिया था । इसलिए रतनू चारण भाटियों से अपना भाई का सम्बन्ध मानते थे और भाटी उन्हें बड़े भाई और उद्धारक का मान देते थे । रतनू भीमा इसी शाखा से सम्बन्ध रखता है, इसलिए भाटी नीम्बा से उसके आत्मीय सम्बन्ध हैं ।

यह घटना एक दशहरे के उत्सव की है, उस उत्सव में चारण भीमा रतनू भी उपस्थित था । उचियारड़ा ग्राम में दशहरा मनाया जा रहा था और देवी पूजन किया जा रहा था । देवी की पूजा के लिए बलि का विधान था ।
अत: बलि के लिए खाजरू (बकरा) लाया गया, जो बकरा बलि हेतु लाया गया था, उसकी गर्दन के नीचे लम्बे बाल दाढ़ी की तरह लटक रहे थे । भाटी नीम्बा के भी लम्बी दाढ़ी थी । जब बलि के लिए बकरा लाया जा रहा था, तब कुछ सांखलों के किशोर-युवा उस बकरे को ‘नीम्बाजी भाटी’ नाम से संबोधित करते हुए भाटी नीम्बा का उपहास करने लगे, न केवल उपहास ही किया बल्कि बलि देते समय भी कहा कि ‘नीम्बाजी भाटी’ की बलि दी जा रही है । यह सब रतनू भीमा ने अपनी आँखों से के सामने घटित होते देखा, उसका खून खौल उठा । वह अकेला सांखलों का तो कुछ बिगाड़ नहीं सकता था, इसलिए वहां तो कुछ नहीं बोला पर उसके कलेजे में आग लगी थी ।

वह सीधा नाई के पास पहुंचा और भदर हो गया, भदर होना मृत्युसूचक संकेत होते हैं, जिसमें व्यक्ति न केवल मुण्डन करवाता है, अपितु दाढ़ी-मूंछ भी मुंडवा लेता है । ठीक मृत्युसूचक बाना धारण कर रतनू भीमा भाटी नीम्बा के पास पहुंचा । भाटी नीम्बा ने भीमा से पूछा – ‘बारहठजी किसके पीछे भदर हुए हो ?’ भीमा ने सजल आँखों से कहा – ‘नीम्बाजी भाटी के पीछे ।’ भाटी नीम्बा के बात समझ में नहीं आई, तब रतनू भीमा ने सारी बात बताई और यह भी कहा कि बात केवल किशोरों-युवाओं की होती, तब भी परिहास समझ कर उसे छोड़ा जा सकता था, पर किसी बुजुर्ग तक ने उन्हें टोका नहीं, उलटे हंसने लगे ।

भाटी नीम्बा यह सब सुनकर तिलमिला उठे, उन्होंने अपना साथ इकट्ठा किया और बलि-पूजा में उन्मादित सांखलों पर टूट पड़े । बचेखुचे सांखले गाँव छोड़ कर भाग गए, तब जाकर रतनू भीमा के कलेजे में ठंडक पड़ी, पर चीजों का अंत कहाँ होता है । बचेखुचे सांखलों में से एक सांखला आगरा जा पहुंचा और पठान जलालखां जलवानी के यहाँ नौकर हो गया ।

लोकाख्यानों में आता है कि इस पठान जलालखां जलवानी ने अपने उस नौकर के कहने से भाटी नीम्बा और उसके साथियों को उचियारड़े ग्राम में खत्म कर दिया था । यह भी सुनने में आता है कि भाटी नीम्बा ‘गिरी-सुमेल’ की लड़ाई में घायल हो गया था और वह अपने घायल साथियों के साथ अपने गाँव में  घावों का उपचार कर रहा था, कि यह घटना घटित हो गई ।

उसका पुत्र भाटी माना किसी तरह बच निकला और केलावा ग्राम में अज्ञातवास में रहने लगा । वहां उसकी स्थिति यह थी कि घर में खाने पीने के लाले पड़ रहे थे । पत्नी गर्भवती थी, बच्चा होनेको था, पर घर में फूटी कौड़ी भी नहीं थी । लाचार माना ने चोरी करने की ठानी । गर्भवती पत्नी को कराहते छोड़कर वह चोरी करने निकला ।

पास में ही ऊँटों के टोले (समूह) के साथ एक व्यापारिक कारवाँ रुका हुआ था । वह कारवाँ के ऊँटों में छिप कर चोरी का मौका तलाश ही रहा था कि उसके घर में लड़के होने की सूचक थाली बजी । थाली बजने की ध्वनि सुनकर कारवाँ के साथ चल रहे शकुनी ने भविष्यवाणी करते कहा  - ‘अगर यह बच्चा राजपूत के घर जन्मा है तो बड़ा प्रतापी होगा और राजा भी इससे सलाह लेकर काम करेगा । और अगर यह बच्चा जाट के घर जन्मा है तो गाँव में इसका डाला लूण पड़ेगा ।’ भविष्यवाणी सुनकर माना शकुनी के चरणों में गिर पड़ा और अपनी सारी बेबशी व हकीकत बताई ।

हकीकत सुनकर शकुनी जो जाट था, उसे कारवां के मालिक के पास ले गया और भाटी माना को रोटी-पानी की सहायता की । अनाज की पोटली लेकर जब वह घर पहुंचा, तब दाई ने पहले तो माना को इस स्थिति में पत्नी को छोड़ जाने के लिए डांटा । फिर पत्नी की आंवळ ( गर्भ-नाल ) का बर्तन देते हुए कहा कि इसे हाथ भर गहरा गड्ढा खोदकर गाड़ना ताकि कोई जानवर निकाल नहीं पाए । अपने घर के पिछवाड़े जब माना ने हाथ भर गहरा गड्ढा खोदा तो उसका हाथ किसी धातु के बर्तन से टकराया । खोदकर निकालने पर उस ताम्बे के बर्तन में सोने की मोहरें मिली| शकुनी की भविष्यवाणी सच्च होने की शुरुआत हो चुकी थी | यही बच्चा आगे चल कर इतिहास प्रसिद्ध भाटी गोयन्ददास ( गोविन्ददास ) के नाम से विख्यात हुआ ।।

साभार- आईदानसिंह भाटी

गुरुवार, 8 सितंबर 2016

शहीद पूनमसिंह भाटी


भारत के इतिहास में और वीर योद्धा भूमि राजस्थान की बलीदानी परम्परा में जैसलमेर में जन्मे पुनमसिंह भाटी का नाम अमर है । पांचवी कक्षा तक अध्ययन करने के पश्चात् सत्रह वर्षीय पूनमसिंह सन 1956 में राजस्थान में चलाये गए ऐतिहासिक भूस्वामी आंदोलन का सत्याग्रही सत्यागढ़ी बनकर जेल चले गए । तीन माह की जेल भुगतने के पश्चात् पूनमसिंह नोकरी की तलाश में लग गए । अक्टूम्बर 1961 में वह अपने ग्राम साथी सुल्तान सिंह भाटी के साथ पुलिस सेवा में भर्ती हो गए !
 जैसलमेर जिला मुख्यालय से लगभग 120 किलोमीटर दूर भारत पाक सीमा की भुट्टो वाला सीमा चौकी पर राजस्थान पुलिस के कुल चार पाँच सिपाहियों के साथ जैसलमेर जिले के हाबुर (वर्तमान पूनमनगर) गांव का एक नवयुवक पूनम सिंह भाटी अपने देश की सरहद हिफाजत में अपने कर्तव्य का पालन कर रहा था ।इनके पिताजी का नाम जय सिंह भाटी और माताजी का नाम श्रीमती धाय कँवर था।
09 सितम्बर के दिन अपने गांव हाबुर में कुलदेवी माँ स्वांगियां का मेला था ।अपनी कुलदेवी के मेले में जाकर आशीर्वाद प्राप्त करने की चाह में 08 सितम्बर के दिन अस्त होने से पूर्व ही पूनम सिंह अवकाश लेकर अपने गांव की तरफ निकल पड़ा।
1965 के उस दौर में आवागमन के लिए मात्र ऊंट पर ही निर्भर रहना पड़ता था । भुट्टो वाला चौकी से भाटी का गांव लगभग 70 किमी की दुरी पर था । 
अभी भुट्टो वाला से 10 किमी तक का सफर ही तय किया था कि सामने पूनम सिंह के मुंह बोले एक भाई का गोळ (रहने का अस्थाई निवास)था। अपने मुंहबोले भाई के अनुरोध पर भाटी ने रात वहीँ रुकने का निश्चय किया , सोचा रात को यहाँ आराम करने के बाद सुबह गांव की और जल्दी निकलेंगे। लेकिन माँ स्वांगिया और कुदरत को कुछ और ही मंजूर था । रात को अपने मुंह बोले भाई और उसके बेटे की कानाफूसी सुनकर पूनम सिंह ने उनसे बात पूछी की आखिर माजरा क्या है। भाई ने कहा- कि पूनम अब तुम्हे अपने गांव की और निकलना चाहिए ताकि सुबह माता के मेले में समय से पहुँच सके। 
कुछ समय पूर्व रात यंहा रुकने का अनुरोध करने वाला यह भाई ऐसा क्यों बोल रहा है इसकी सचाई भांपते इस वीर को ज्यादा समय खर्च नहीं करना पड़ा। भाई के बेटे ने पूनम के सामने सारी बात एक ही साँस में कुछ यूँ रखी -" पाकिस्तान के कमांडर अफजल खान के साथ लगभग 40 घुसपैठिये भुट्टो वाला चौकी पर कब्जा करने के लिए चौकी की तरफ कूच कर चुके है लेकिन आप के तो ड्यूटी से 2-4 दिन के लिए अवकाश लिया हुआ है इसीलिए कह रहे है कि आप गांव की और निकल जाइये"।
आँखों में अंगारे उतर आये भाटी के एक ही झटके में खड़ा होकर सिंह की मानिंद गर्जना की-"पूनम सिंह भाटी अगर इस समय अपने कदम पीछे की और बढ़ाता है तो यह  जैसाण का अपमान होगा, अपमान होगा मेरी जन्मदात्री का, अपमान होगा भाटियों के उस विड़द उत्तर भड़ किवाड़ भाटी का,अपमान होगा भाटी वंश के उन तमाम वीरों का जिन्होंने जैसाण रक्षा हेतु केशरिया किया था , मेरा पीछे की ओर पड़ा हर एक कदम लज्जित करेगा गढ़ जैसाण को,लज्जित करेगा मेरी माँ के दूध को , पूनम सिंह के जिन्दा रहते भुट्टो वाला चौकी को अफजल खान तो क्या पूरी पाकिस्तानी आर्मी भी नहीं जीत सकती इतना कहते ही बिजली की गति से अपने ऊंट पर सवार होकर निकल पड़ा वापिस भुट्टो वाला चौकी की तरफ।
रात में चन्द्रमा की रौशनी में चारों तरफ फैले थार के इस महान रेगिस्तान का हर एक अंश सोने की तरह दमक रहा था । रात के इस सन्नाटे में धीमी गति से चलने वाली पवन की सांय-सांय को चीरता पूनम का ऊंट अपने मालिक को ले जा रहा था अपने गन्तव्य की ओर ।ऊँट जितना तेज दौड़ सकता था उतना तेज दौड़े जा रहा था मानो उसे भी अपने मालिक की तरह अपनी सरजमीं की हिफाजत का जूनून सवार हो।आधी रात को पूनम ने अपनी चौकी में प्रवेश किया । 
वहां बैठे हवलदार गुमान सिंह रावलोत के साथ  अन्य सिपाही पूनम के चेहरे को पढ़ने की कोशिस कर है थे कि आखिर हुआ क्या है इतनी जल्दी यह वापिस क्यों आ गया? उनके हर एक सवाल का जवाब पूनम ने पास में रखी बन्दूक उठाकर दिया । इस समय पूनम का बन्दूक संभालना उन वीरों को यह समझाने के लिए काफी था कि हमला किसी भी वक्त हो सकता है। 
अभी समय ज्यादा नहीं हुआ था कि चन्द्रमा की रौशनी में पूनम ने लगभग 35-40 इंसानी परछाइयों को चौकी की तरफ आते देखा। तब तक साथी भी समझ चुके थे कि चौकी को चारों और से दुश्मनों ने घेर लिया है।
एक क्षण तो पूनम का चेहरा रक्तवर्ण का हो चुका था आँखों में अंगारे तैर आये लेकिन दूसरे ही पल अपने आपको सँभालते हुए अपने साथियों को निर्देश देने लगा -"हमारे पास गोलियों की कमी है हर एक गोली सोच समझकर चलानी है एक भी गोली व्यर्थ नहीं जानी चाहिए"। इतना कहकर रेत के बने अपने बंकर में मोर्चा संभाल लिया। दूसरे साथी भी मोर्चा संभाले हुए थे पहली गोली चलने के बाद उस चांदनी रात में दुश्मनो के लिए साक्षात् महाकाल बनकर टूटा पूनम।
माँ स्वांगिया के आशीर्वाद से इस बियाबान रेगिस्तान में पूनम और उसके साथियों की बन्दुके रह रहकर आग उगल रही थी । पूनम सिंह और उसके साथियों को एक बात निश्चित पता थी कि इस रेगिस्तान में हिंदुस्तानी सेना या राजस्थान पुलिस की सहायता मिलना बहुत ही मुश्किल था क्योंकि उस दौर में संचार के साधन नहीं थे । मोर्चा लिए हुए पूनम अपने साथियों में लगातार जोश भर रहा था तथा उन्हें यह बात भी अच्छे से समझा दी कि हम हमारे जीते जी अपनी इस चौकी को छोड़ नहीं सकते इसलिए केवल एक ही रास्ता है कि इन घुसपैठियों का काम तमाम करना ।रात के अँधेरे में पुराने हथियारों के दम पर माँ भारती के इन सपूतों ने पाकिस्तानी कमांडर अफजल खान सहित लगभग 15 घुसपैठियों को ढेर कर दिया था जिसमे अफजल खान सहित कुल 7 की मौत पूनम के अचूक निशाने का परिणाम थी।
इस दौरान अपने कमांडर के मारे जाने से विरोधियों के पैर उखड़ने लगे थे । उन्हें आज समझ आ गया था कि उनका पाला भारत के शेरों से पड़ा है । हालाँकि बन्दुके अभी भी गरज रही थी लेकिन अब हर एक गोली छूटने के काफी देर बाद दूसरी गोली छूट रही थी ।4-5 घण्टे के इस मैराथन युद्ध में हमारी पुलिस की गोलियां लगभग समाप्त हो गयी थी । एक बार फिर पूनम के साथियों के माथे पर चिंता की लकीरे आ गई क्योंकि वे जानते थे सुबह होने में महज  घण्टे भर का फासला है अगर कारतूसों का बन्दोबस्त नही हो पाया तो चौकी पर कब्जा रोकना असम्भव होगा। 
अपने साथियों की परेशानी देखकर पूनम ने अपने बंकर से बाहर झाँका पास में गिरी एक पाकिस्तानी लाश के कमर पर बंधा कारतूसों का बेल्ट देखकर पूनम की आँखों में चमक सी आ गई।लेकिन वहां तक पहुंचना मुश्किल था क्योंकि उसके ठीक पीछे बाकि के पाकिस्तानी रेत की आड़ में बैठे थे लेकिन भाटी निश्चय कर चुका था उसने रेंगकर किसी तरह उस बेल्ट को पाने में सफलता प्राप्त कर ही ली अब एक बार फिर बाजी भारतीय शेरों के हाथ में थी पाकिस्तानियों के पीछे हटते कदमो को देखकर पुरे जोश के साथ फायरिंग हो रही थी कि तभी दुर्भाग्य से दुश्मन की बन्दूक से निकली एक गोली पूनम के ललाट में धंस गई । पूनम के साथियों के सामने यह एक भयंकर दृश्य था । लेकिन पूनम के चेहरे पर चिर परिचित मुस्कान.......समय मानो अपनी आम रफ़्तार से कुछ तेज दौड़ रहा था साथियों की आँखों में आंसुओ की बाढ़ सी आने लगी थी । पूनम का हर एक साथी उसे मानो यह बताना चाह रहा हो कि देखो तुम्हारी बन्दूक का कमाल दुश्मन पीठ दिखाकर भाग रहा है । लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था सुबह की लालिमा से रेत फिर जगमगा रही थी लेकिन उसी समय जैसलमेर की धरा का एक सपूत चिर निद्रा के आगोश में समा चुका था।पूनम ने फिर इस राजस्थान भूमि का नाम रोशन कर दिया जिसके बारे में कहा जाता रहा है कि रेगिस्तान कि भूमि वीर प्रसूता भूमि है।
कुछ समय बाद नजदीकी गांव साधना में पूनम सिंह के शहीद होने की सुचना पहुंची गांव वालों और पुलिसवालों के सहयोग से भाटी के पार्थिव शरीर को पहले साधना गांव लाया गया।
दूसरी और हाबुर गांव में कुलदेवी के मेले की तैयारियां चल रही थी बच्चे ,बूढ़े,महिलाये और युवा माँ स्वांगिया की पूजा हेतु तैयार होकर जाने ही वाले थे कि पूनम के शहीद होने की खबर आ गई । पुरे गांव में आग की तरह फैली यह ख़बर ।क्या बूढ़ा क्या जवान हर एक ग्रामीण कि छाती गर्व से फूली हुई थी।
पूनम के घर में सिसकियाँ के साथ परिवारजनो को ढांढस बंधाया जा रहा था ग्रामीण जोश में एक दूसरे को गर्व से बता रहे थे कि -पूरी रात डटा रहा अपना पूनम अपने मोर्चे पर, और पाकिस्तानियों को भगाकर ही सांस छोड़ी ।
उसी दिन शहीद का पार्थिव शरीर जैसलमेर शहर लाया गया । जहाँ आम जनता अपने इस हीरो को अंतिम बार नजर भरकर देख रही थी। हर कहीं से एक ही आवाज आ रही थी कि आज फिर जैसाण के एक बहादुर सिपाही ने अपने अदम्य साहस से अपने कुल,अपने परिवार,अपने वँश की बलिदानी परम्परा को अक्षुण् रखने हेतू,अपनी भारत माँ के चरणो में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।
धन्य है हाबुर की वो परम धरा जहाँ ऐसे सपूत ने जन्म लिया, धन्य है वो माँ जिसने पूनम जैसे वीर को जन्म दिया, धन्य है वो पिता जिसने अपने बेटे में मातृभूमि के लिए मर मिटने के संस्कार डाले। 
इन सबके साथ धन्य हुआ भुट्टो वाला का वो रेगिस्तान जहाँ इस बहादुर के रक्त की बुँदे गिरी।
मरणोपरांत शहीद को राष्ट्रपति पदक से समान्नित किया गया तथा शहीद पूनम सिंह के नाम से उनके गांव का नाम बदलकर श्री पूनमनगर किया गया । जैसलमेर शहर में शहीद पूनम सिंह स्टेडियम का निर्माण भी करवाया गया।
शहीद पूनम सिंह बलिदान दिवस समिति के संयोजक ठाकुर लख सिंह पूनमनगर के प्रयासों से शहीद के बलिदान दिवस अब प्रत्येक वर्ष 09 सितम्बर को जैसलमेर जिला मुख्यालय एवम् भाटी के  पैतृक गांव में मनाये जाते हैं।तथा पुरानी भुट्टो वाला सीमा चौकी(रामगढ से 50 किमी) पर भी भाटी की छतरी पर पूजा अर्चना की जाती है।
पुनमे नों हाबोनों आज भी लोकगीत उनकी याद में गाये जाते है आज उनके सहादत दिवस पर शत शत नमन धन्य है धरा ऐसे सपूत पैदा हुए

जगदेव परमार

जगो यहाँ पर जगदेवों की लगी है बाजी जान की।
अलबेलों ने लिखी खड़ग से गाथाएँ बलिदान की।॥

जगदेव परमार मालवा के राजा उदयादित्य के पुत्र थे। मालवा की राजधानी धारानगरी थी जो कालान्तर में उज्जैन नगर के नाम से प्रसिद्ध हुई। मालवा के परमार वंश में हुए राजा भर्तृहरि बाद में महान नाथ योगी (सन्त) बने, भर्तृहरि के छोटे भाई राजा वीर विक्रमादित्य बड़े न्यायकारी राजा हुये। विक्रम सम्वत इसी ने हुणों पर विजय के उपलक्ष में चलाया था। विद्याप्रेमी एवं वीर भोज भी मालवा के परमार राजा थे, जो स्वयं विद्वान थे। बारहवीं शताब्दी में इस प्रदेश ने एक ऐसा अनुपम रत्न प्रदान किया जिसने वीरता और त्याग के नये-नये कीर्तिमान स्थापित कर क्षात्र धर्म को पुनः गौरवान्वित किया। यह वीर थे जगदेव परमार। लोक गाथाओं में इन्हें वीर जगदेव पंवार के नाम से याद किया जाता है।

राजा उदयादित्य की दो पत्नियाँ थी। एक सोलंकी राजवंश की और दूसरी बाघेला राजवंश की। सोलंकी रानी के जगदेव नाम का पुत्र और बघेली रानी से दूसरा पुत्र रिणधवल था। राजकुमार जगदेव बड़ा थे। राजकुमार जगदेव साहसी योद्धा था और सेनापति के रूप में उसकी कीर्ति सारे देश में फैल गई थी। अपनी बाघेली रानी के प्रभाव से प्रभावित होकर उदयादित्य ने रिणधवल को युवराज चुना। अपनी सौतेली माता की ईर्ष्या के कारण जगदेव कष्टमय जीवन व्यतीत कर रहे थे। वह मालवा से चले गये और जीविका के लिए गुजरात में सिद्धराज जयसिंह के अधीन सैनिक सेवा स्वीकार की। वह अपनी वीरता और स्वामीभक्ति से बहुत ही अल्पकाल में अपने स्वामी के प्रिय हो गये। कुछ आसन्न संकट से सिद्धराज की सुरक्षा करने के लिए अपने जीवन को अर्पण किया। जगदेव परमार ने कंकाळी (देवी) के सामने अपना मस्तक काट कर अर्पित कर दिया था, जिससे देवी ने उसके बलिदान से प्रसन्न होकर उन्हें पुनर्जीवित कर दिया था। जगदेव ने यह बलिदान अपने स्वामी पर आए संकट के अवसर पर दिया था। जब राजा को उसके इस बलिदान का पता लगा तो उसने प्रसन्न होकर उनको एक बहुत बड़ी जागीर दी। और अपनी एक पुत्री का विवाह जगदेव के साथ कर दिया।

कुछ समय बाद यह सूचना पाकर कि सिद्धराज मालवा पर आक्रमण करने की तैयारियाँ कर रहा है, उसने अपना पद त्याग कर अपनी जन्मभूमि की रक्षा करने के लिए धारा नगरी चला आया। उसके पिता ने उसका बड़े स्नेह से स्वागत किया और रिणधवल के स्थान पर जगदेव को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। उदयादित्य की मृत्यु के पश्चात् जगदेव मालवा के सिंहासन पर बैठे।

राजस्थान की लोक गाथाओं में वह जगदेव पंवार के नाम से जाने जाते है जबकि मालवा में लक्ष्मदेव के नाम से प्रसिद्ध हुये। जगदेव वि.सं. ११४३ (ई.स. १०८६) के लगभग मालवा के राजा बने। वह एक बड़ी सेना लेकर दिग्विजय के लिए निकले। बंगाल के पाल राजा पर आक्रमण कर वहाँ से बहुत से हाथी लूटकर लाये। इसके बाद चेदी प्रदेश के कलचुरियों पर आक्रमण करने के लिए बढे। उस समय वहाँ यश:कर्ण का राज्य था। यश:कर्ण साहसी योद्धा था और चम्पारण विजय कर कीर्ति प्राप्त की थी। किन्तु वह मालवा सेना के आक्रमण के सामने ठहर नहीं सका। जगदेव (लक्ष्मदेव) ने उसके राज्य को पद दलित किया और उसकी राजधानी त्रिपुरी को लूटा। उसने अङ्ग और कलिंग राज्य की सेनाओं को परास्त किया।
जगदेव ने दक्षिण भारतीय राज्यों पर भी आक्रमण किए थे। लेकिन दक्षिणी राज्यो में आपस में मैत्री होने से वह सफल न हो सके। मालवा के दक्षिण में चोलों का राज्य था। दोनों राज्यों के बीच बहुत कम दूरी रह गई थी। इस क्षेत्र पर अधिकार करने के लिए दोनों ही राज्य लालायित थे अतः दोनों में युद्ध होना अवश्यंभावी हो गया। जगदेव का चोल राजा कुलोतुंग प्रथम से संघर्ष हुआ। युद्ध में चोल पराजित हुए।

गुजरात के सीमान्त पहाड़ी क्षेत्रों में बर्बर पहाड़ी जनजातियाँ निवास करती थी जो सन्त, पुण्यात्मा ऋषियों को निरन्तर दुःख देते थे। जगदेव ने उन बर्बर जातियों को दण्डित किया। कांगड़ा जनपद के कीरों से युद्ध कर उन्हें परास्त किया। उसके समय में मुसलमानों ने मालवा पर चढ़ाई की। मुस्लिम सेना को कुछ प्रारम्भिक विजय प्राप्त हुई। किन्तु अंततः वे जगदेव द्वारा पीछे ढकेल दिए गए। जगदेव (लक्ष्मदेव) एक वीर योद्धा और निपुण सेनानायक थे। पश्चिमी भारत के लोग अब भी जगदेव के नाम का उसकी उच्च सामरिक दक्षता व बलिदान के लिए हमेशा स्मरण करते हैं। निश्चय ही वे ग्यारहवीं शती के अन्तिम चरण का एक उतुंग व्यक्ति थे। एक उल्का की तरह वह थोड़े समय के लिए मध्यभारत के क्षितिज में चमके और अपने पीछे चिरकीर्ति छोड़ कर लोप हो गये। शासक के रूप में वह अत्यन्त दयालु, प्रजा वत्सल और न्यायकारी राजा थे। सम्राट विक्रमादित्य और राजा भोज की उदात्त परम्पराएं इन्होंने पुनः शुरु की। वेष बदल कर ये जनता की वास्तविक स्थिति का पता लगाने जाया करते थे। प्रजा की भलाई के अनेक कार्य किये। इनका शासन काल लगभग वि.सं. ११५२ (ई.स. १०९५) तक रहा।

लेखक : छाजूसिंह, बड़नगर